Sunday, May 8, 2011

नागरिक पत्रकारिता

दुनिया भर के मीडिया में इन दिनों नागरिक पत्रकारिता यानी सिटिजन जर्नलिज्म को लेकर गरमागरम बहस छिड़ी हुई है। हालांकि भारतीय मीडिया के लिए यह शब्द अपेक्षाकृत नया है लेकिन उसे लेकर अब मुख्यधारा के मीडिया में भी हलचल शुरू हो गई है। कुछ महीनों पहले जब वरिष्ठ टीवी पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने अपने नए चैनल सीएनएन-आईबीएन की शुरूआत की तो उसके प्रचार होर्डिंगों में प्रमुख थीम नागरिक पत्रकारिता को ही बनाया गया था। इसमें आम नागरिकों का आह्वान किया गया था कि वे 'सिटिजन जर्नलिस्ट` (नागरिक पत्रकार) बनने के लिए आगे आएं। सीएनएन-आईबीएन की वेबसाइट पर भी लोगों को सिटिजन जर्नलिस्ट बनने के लिए आमंत्रित किया गया है। चैनल का कहना है कि उसके दर्शकों या आम लोगों में से किसी के पास अगर कोई महत्वपूर्ण खबर और उसकी वीडियो क्लिप हो तो वे उसे चैनल को भेज सकते हैं।

सीएनएन-आईबीएन अपने सिटिजन जर्नलिस्ट अभियान के तहत समय-समय पर दर्शकों से मानसून, आरक्षण विरोधी आंदोलन और ऐसे ही सामयिक मुद्दों पर वीडियो क्लिप/फुटेज भेजने की अपील करता रहता है। उसकी अपील पर लोग उसे खबरें और वीडियो/फिल्म भेज भी रहे हैं और उसमें से कुछ खबरें और वीडियो क्लिप चैनल पर दिखाए भी जा रहे हैं। लेकिन अभी तक इक्का-दुक्का मामलों को छोड़कर सिटिजन जर्नलिस्टों की ओर से कोई उल्लेखनीय खबर या फुटेज नहीं आई है। इसके बावजूद चैनल ने नागरिक पत्रकारों को प्रोत्साहित करने के लिए इस साल सर्वश्रेष्ठ नागरिक पत्रकार को पुरस्कार देने की घोषणा भी की है। उसे उम्मीद है कि वह अपने इस अभियान के जरिये बड़ी संख्या में दर्शको को अपने साथ जोड़ पाएगा। यह भी संभव है कि उसे भविष्य में अपने नागरिक पत्रकारों से कोई बड़ी खबर या फुटेज भी मिल जाए जो चैनल की व्यावसायिक सफलता के लिए जरूरी है।

सीएनएन-आईबीएन की देखा-देखी कुछ और समाचार चैनलों और अखबारों ने अपने दर्शकों और पाठकों को खबरें और वीडियो क्लिप भेजने के लिए प्रोत्साहित करना शुरू कर दिया है। इसका असर भी हुआ है और इन चैनलों और अखबारों में दर्शकों और पाठकों की ओर से भेजी गई खबरों और वीडियो क्लिप को अक्सर दिखाया भी जा रहा है। हालांकि अभी यह शुरूआत है और उसके विभिन्न स्याह-सफेद पहलुओं पर एक व्यापक चर्चा होना बाकी है। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि नागरिक पत्रकारिता ने भारत में भी दस्तक दे दी है। अभी हम चैनलो पर नागरिक पत्रकारिता का सिर्फ एक रूप देख रहे हैं लेकिन अगर दुनिया के और देशों खासकर विकसित देशों के अनुभवों को ध्यान में रखें तो यह स्पष्ट है कि आनेवाले दिनों में यह विचार और जोर पकड़ेगा।

नागरिक पत्रकारिता : एक विचार जिसका समय आ गया है
दरअसल, नागरिक पत्रकारिता वह विचार है जिसका समय आ गया है। मुख्यधारा के कई समाचार संगठनों और पत्रकारो की ओर से व्यक्त किए जा रहे संदेहों और उपेक्षा के भाव के बावजूद अब उसे रोकना संभव नहीं रह गया है। इसकी कई वजहे हैं। यह सिर्फ संयोग नहीं है कि नागरिक पत्रकारिता भारत में उस समय दस्तक दे रही है जब लंबे संघर्ष के बाद आम नागरिकों को सूचना का अधिकार मिला है। सूचना के अधिकार ने हर नागरिक को एक पत्रकार के अधिकार, सतर्कता और तत्परता से लैस कर दिया है। जाहिर है अब सूचनाओं पर मुट्ठीभर लोगों का अधिकार नहीं रह गया है। पत्रकारों के साथ-साथ अब आम नागरिकों को भी सूचना मांगने का कानूनी अधिकार मिल गया है।
यही नहीं, देश भर में दर्जनों नागरिक संगठन लोगों को सूचना के अधिकार के इस्तेमाल के लिए तैयार और प्रोत्साहित कर रहे हैं। लोग सार्वजनिक से लेकर निजी मामलों तक में सरकार और उसके विभिन्न संगठनों से सूचनाएं मांग रहे हैं। इस तरह अब सूचनाएं सिर्फ पत्रकारों के पास ही नहीं बल्कि आम लोगों के पास भी हैं। कई मामलों में तो पत्रकारों से कहीं ज्यादा सूचनाएं आम लोगों के पास हैं। उनमें से कई सूचनाएं सार्वजनिक महत्व की हैं। उन सूचनाओं का हजारों-लाखों लोगों से सीधा सरोकार है। ये सूचनाएं समाचार की किसी भी परिभाषा और कसौटी पर खरी उतरती है। कोई भी समाचार संगठन उन्हें नजरअंदाज करने का जोखिम नहीं उठा सकता है। अगर वह उन्हें नजरअंदाज करता है तो न सिर्फ उसकी विश्वसनीयता को धक्का लगता है बल्कि वह अपने प्रतियोगी समाचार संगठन को उस सूचना के इस्तेमाल का अवसर मुहैया करा रहा है।

कहने की जरूरत नहीं है कि इस प्रक्रिया में हजारों नागरिक भविष्य के पत्रकार की भूमिका के लिए तैयार हो रहे हैं। अगर पत्रकारिता का अर्थ सूचनाओं का संग्रह, उनकी प्रोसेसिंग और किसी जनमाध्यम के जरिए व्यापक ऑडियंस तक उसकी प्रस्तुति है तो सूचना के अधिकार का इस्तेमाल कर सूचनाएं हासिल कर रहे नागरिक भी पत्रकार की भूमिका के लिए तैयार हो रहे है। इन नागरिक पत्रकारों की खूबी यह है कि वे न सिर्फ मुख्यधारा के समाचार मीडिया के पाठक, दर्शक और श्रोता (ऑडियंस) हैं बल्कि वे पुराने दौर के निष्क्रिय ऑडियंस की तुलना में अपने अधिकारों को लेकर सक्रिय ऑडियंस हैं। वे खुद को सिर्फ सूचनाएं हासिल करने तक सीमित रखने को तैयार नहीं हैं। वे उन सूचनाओं का हथियार की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं।

लोकतंत्र में यह तभी संभव है जब इन सूचनाओं को एक बड़ा ऑडियंस मिले। इसके बिना सार्वजनिक जीवन और कामकाज में जिम्मेदारी और उत्तरदायित्व तय करने के लिए हासिल सूचनाओं का प्रभावी उपयोग नहीं किया जा सकता है। आखिर सार्वजनिक पदो पर बैठे अफसरों और कार्यालयों में सूचना के अधिकार का दबाव इसीलिए बना है क्योंकि उन्हें पता नहीं होता कि प्राप्त सूचनाओं का लोग किस तरह से और क्या इस्तेमाल करेगें। उन्हें इस बात का भय होता है कि जब ये सूचनाएं सार्वजनिक हो जाएंगी तो लोग उन सूचनाओं पर प्रतिक्रिया करेंगे। इससे एक जनमत और जनदबाव पैदा हो सकता है और सरकार को जवाब देने और कार्रवाई करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।

लेकिन यह तब तक संभव नहीं है जब तक ये सूचनाएं एक बड़े जनसमुदाय तक न पहुंचे। जाहिर है कि उन सूचनाओं को व्यापक जनता तक पहुंचाने के लिए ऐसे जनमाध्यमों की जरूरत है जिनकी पहुंच एक बड़े ऑडियंस तक है। मुख्यधारा का समाचार मीडिया ऐसा ही एक प्लेटफार्म है जो सूचना के अधिकार आंदोलन से पैदा हो रहे नागरिक पत्रकारों को मौका दे सकता है। इसलिए नागरिकों को मुख्यधारा के मीडिया की जरूरत है ताकि वे सूचना के अधिकार का प्रभावी इस्तेमाल कर सके। स्वयं समाचार माध्यमों के लिए भी यह एक बेहतरीन अवसर है जिसका इस्तेमाल कर वे अपने ऑडियंस और साथ ही साथ अपने कवरेज का भी विस्तार कर सकते है।

ऐसा करके वे काफी हद तक उस ''लोकतांत्रिक घाटे`` की भी भरपाई कर सकते हैं जो पिछले कुछ वर्षों में मुख्यधारा के समाचार संगठनों की सबसे बड़ी कमजोरी बन गई है। दरअसल, मुख्यधारा के मीडिया में आम नागरिकों के सरोकारों और चिंताओं को नजरअंदाज करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। मुख्यधारा के मीडिया का जैसे-जैसे क्रिकेट, क्राइम, सिनेमा और सेलीब्रिटी यानि फोर सीज के प्रति ऑब्सेशन बढ़ता गया है, वैसे-वैसे मीडिया में आम नागरिकों खासकर हाशिए पर पड़े लोगों की समस्याओं, जरूरतों और चिंताओंं के लिए जगह और सहानुभूति कम होती गई है। इस कारण मुख्यधारा के मीडिया और आम नागरिकों के बीच दूरी लगातार बढ़ रही है। यह एक तरह का लोकतांत्रिक घाटा है जिसने समाचार माध्यमों की विश्वसनीयता को भी काफी नुकसान पहुंचाया है।

इस कारण मुख्यधारा के समाचार माध्यमों के पास नागरिक पत्रकारिता को जगह देकर अपनी बची-खुची विश्वसनीयता को बनाए रखने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं बचा है। इसकी वजह यह है कि हाल के वर्षों में मुख्यधारा के मीडिया की अपरिहार्यता लगातार कम हुई है। मुख्यधारा के मीडिया पर जैसे-जैसे कारपोरेट हितों और प्रभुत्वशाली वर्गों का वर्चस्व बढ़ा है, आम लोगों से उसकी दूरी बढ़ी है, वैसे-वैसे नागरिकों और उनके संगठनों में भी वैकल्पिक मीडिया मंचों की तलाश तेज हुई है। जाहिर है कि नागरिक पत्रकारिता भी एक ऐसा ही वैकल्पिक मीडिया मंच उपलब्ध कराती है। इसलिए नागरिक पत्रकारिता की जमीन नीचे से भी तैयार हो रही है।

नागरिक पत्रकारिता के विचार को अगर सूचना के अधिकार ने ताकत और गति दी है तो नए मीडिया और संचार माध्यमों ने उसे आसान बना दिया है। निश्चय ही, आज से कुछ वर्षों पहले तक वैकल्पिक मीडिया को खड़ा करना जितना श्रमसाध्य था और उसके लिए जितनी पूंजी और संसाधनों की जरूरत थी, नए माध्यमों (खासकर इंटरनेट) ने उसे काफी हद तक सरल, सहज और कम खर्चीला बना दिया है। आज आप कुछ हजार रुपयों में अपनी एक वेबसाइट शुरू कर और चला सकते हैं। अगर यह भी संभव न हो तो आप बिना किसी खर्च के अपना एक ब्लॉग शुरू कर सकते हैं। दुनियाभर में इंटरनेट ने वेबसाइट, ब्लॉग और अन्य दूसरे तरीकों से लाखों नागरिकों को अपनी बात कहने और एक-दूसरे से संपर्क और संवाद करने का मौका दिया है। सच तो यह है कि नागरिक पत्रकारिता का वास्तविक और प्रभावी रूप नए माध्यमों के जरिए ही सामने आया है।

दरअसल, इंटरनेट पर व्यक्तियों से लेकर नागरिक समूहों तक की सक्रिय उपस्थिति ने एक तरह की छोटी-छोटी लाखों क्रांतियां पैदा कर दी हैं। कुछ इस हद तक कि मुख्यधारा के माध्यमों को भी नोटिस लेना पड़ रहा है और उसे अपने अंदर जगह देने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। सीएनएन-आईबीएन इस मामले में कोई अपवाद नहीं है। दुनिया के कई देशों विशेषकर विकसित देशों में मुख्यधारा के मीडिया को अपनी साख बचाने के लिए नागरिक पत्रकारिता को अपने मंच पर जगह देनी पड़ रही है। यह ठीक है कि भारत में अभी नए माध्यमों का अपेक्षित विकास नहीं हुआ है और इन माध्यमों पर काम करने के लिए जिस स्तर की तकनीकी दक्षता और कौशल की जरूरत है, वह बहुत कम नागरिकों के पास मौजूद है। लेकिन भारत में सूचना तकनीक और नए माध्यमों के प्रसार और लोगों में उसे अंगीकार करने की गति इतनी तेज है कि अगले कुछ वर्षों में ऐसे लोगों की तादाद काफी बढ़ जाएगी जो उसे सहजता से इस्तेमाल कर सकेंगे।

इसके अलावा आज मुख्यधारा के अलग-अलग माध्यमों (जैसे प्रिंट बनाम टेलीविजन, इंटरनेट बनाम टीवी और प्रिंट, टीवी बनाम सिनेमा आदि) और मीडिया संगठनों के बीच जैसे-जैसे आपसी प्रतिस्पर्धा तेज हो रही है, वैसे-वैसे उनपर पाठकों, दर्शकों और श्रोताओं यानि ऑडियंस को अपने साथ जोड़ने का दबाव भी बढ़ता जा रहा है। यह तब तक संभव नहीं है, जब तक मीडिया संगठन अपने ऑडियंस को अपना साझेदार नहीं बनाते हैं। अभी तक मीडिया संगठनों में 'संपादक के नाम पत्र`, 'फीड बैक`, 'एसएमएस` जैसे सीमित और शायद अपनी उपयोगिता खो चुके मंचों के अलावा ऐसा कोई माध्यम या प्लेटफार्म नहीं है जिससे आम लोग अपने विचार, मुद्दे, सरोकार और चिंताएं साझा कर सकें। मुख्यधारा के मीडिया ने एक तरह से अपने ऑडियंस को अभी तक 'निष्क्रिय उपभोक्ता` बनाकर रखा हुआ है।

लेकिन नए माध्यमों ने ऑडियंस को सक्रिय बनाया है, उन्हें आवाज दी है, उनके बीच अंतर्क्रिया को बढ़ावा दिया है और उन्हें एकजुट होने का अवसर दिया है। ऑडियंस के बीच आपसी संवाद बढ़ा है और उनका एक तरह से सशक्तिकरण भी हुआ है। नए माध्यमों ने उन्हें अपनी बात कहने की जितनी आजादी दी है, वह उन्हें पारंपरिक जनमाध्यमों में कभी उपलब्ध नहीं थी। आश्चर्य की बात नहीं है कि हाल के वर्षों में नए माध्यमों की लोकप्रियता बहुत तेजी से बढ़ी है। खासकर 15 से 35 वर्ष के युवाओं को नए माध्यमों ने अभिव्यक्ति के व्यापक मौके और विस्तृत क्षितिज प्रदान किए हैं और उनकी गतिविधियों का मुख्य प्लेटफार्म नए माध्यम बन गए हैं। इसी प्रक्रिया में वे नागरिक पत्रकार भी पैदा हो रहे हैं जो सांस्थानिक पत्रकारों और मुख्यधारा के मीडिया के लिए नई चुनौतियां पेश कर रहे हैं। अपनी बात कहने के लिए अब वे मुख्यधारा के मीडिया पर निर्भर नहीं हैं। उनके पास अनेकों विकल्प और माध्यम मौजूद हैं। मुख्यधारा के मीडिया के लिए यह एक खतरे की घंटी है।

क्या है नागरिक पत्रकारिता ?
सवाल उठता है कि आखिर नागरिक पत्रकारिता क्या है ? क्या यह सिर्फ इंटरनेट, ब्लॉग्स आदि तक सीमित है या उसकी जद्दोजहद सिर्फ मुख्यधारा के मीडिया में अपने लिए जगह हासिल करने तक सीमित है ? क्या नागरिक पत्रकारिता की भूमिका किसी टीवी चैनल को कोई वीडियो फुटेज भेज देने तक सीमित है या यह उससे आगे भी जाती है ? कहने की जरूरत नहीं है कि नागरिक पत्रकारिता को लेकर काफी भ्रम हैं और बहुतेरे मीडिया विश्लेषक उसे सार्वजनिक मामलों या जनसुविधाओं की पत्रकारिता (पब्लिक अफेयर्स या सिविक जर्नलिज्म) का ही एक रूप या उसका विस्तार मानते हैं। मुख्यधारा के मीडिया में भी नागरिक पत्रकारिता को लेकर तरह-तरह की आशंकाएं हैं जिनमें से कुछ वाजिब और कुछ स्पष्टता न होने के कारण गैर वाजिब शिकायतें हैं।

दरअसल, नागरिक पत्रकारिता के बाबत अस्पष्टता, भ्रम, आशंकाएं और विवाद इसलिए भी हैं क्योंकि अभी वह एक विकसित हो रही अवधारणा है। यह भी सच है कि नागरिक पत्रकारिता के कई पहलू है। इसके बावजूद नागरिक पत्रकारिता की अवधारणा को लेकर धीरे-धीरे एक सहमति बनती हुई दिखाई पड़ रही है। यह ठीक है कि हर पत्रकार एक नागरिक भी है। लेकिन हाल के वर्षों में अधिक से अधिक नागरिक, पत्रकार बन रहे हैं यानि वे पेशे से तो पत्रकार नहीं है लेकिन कर्म से पत्रकारिता के औजारों का इस्तेमाल कर रहे हैं। नागरिक पत्रकारिता से आशय साझेदारी पर आधारित एक ऐसी पत्रकारिता से है जिसमे आम नागरिक स्वयं सूचनाओं के संकलन, विश्लेषण, रिपोर्टिंग और उनके प्रकाशन-प्रसारण की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। नागरिक पत्रकारिता की अवधारणा को स्पष्टता के साथ सामने लाने वाली शेन बाउमैन और क्रिस विलिस की मशहूर रिपोर्ट 'वी मीडिया : हाउ ऑडियंसेज आर सेपिंग द फ्यूचर ऑफ न्यूज एंंड इंफॉरमेशन` के अनुसार नागरिकों की ''इस भागीदारी का उद्देश्य स्वतंत्र, विश्वसनीय, तथ्यपूर्ण, व्यापक और प्रासंगिक सूचनाएं मुहैया कराना है जो कि एक लोकतंत्र की मांग होती है।`

स्पष्ट है कि नागरिक पत्रकारिता सार्वजनिक मामलों की पत्रकारिता से इस मामले में अलग है कि नागरिक पत्रकारिता में प्रोफेशनल पत्रकार के बजाय आम नागरिक पत्रकार की भूमिका निभाते हैं। आमतौर पर ये वे नागरिक हैं जिन्हें मुख्यधारा का मीडिया नजरअंदाज करता रहा है या जिनके सरोकारों, मुद्दों और समस्याओं को उसमें पर्याप्त जगह नहीं मिलती रही है। एक तरह से यह नागरिकों की ओर से मुख्यधारा के मीडिया में हस्तक्षेप है और साथ ही साथ वैकल्पिक मीडिया मंचों का निर्माण भी है। नागरिक पत्रकारिता किसी एक व्यक्ति के सरोकार से भी संचालित हो सकती है और वह नागरिकों के संगठित समूहों के सरोकारों से भी प्रेरित हो सकती है। लेकिन बुनियादी बात यह है कि नागरिक पत्रकारिता मुख्यधारा के मीडिया में मौजूद ''लोकतांत्रिक घाटे`` (डेमोक्रेटिक डेफिसिट) और व्यावसायिक दबावों के कारण आम नागरिको और वास्तविक मुद्दों की उपेक्षा के जवाब में पैदा हुई है।

दरअसल, मुख्यधारा के मीडिया के कारपोरेटीकरण और तथाकथित प्रोफेशनलिज्म के कारण उसके अंदर एक ऐसी ढांचागत कठोरता (रिजीडिटी) और अहमन्यता पैदा हुई है जिसमें समाचार माध्यमों के अंदर बैठे पत्रकार खुद को हर तरह की आलोचना, सुधार और परिवर्तन से परे समझने लगे हैं। उन्हें लगता है कि वे जिसे समाचार समझते हैं, उसे जिस तरह से प्रस्तुत करते हैं और उसका जिस तरह से विश्लेषण करते हैं, वह न सिर्फ सौ फीसदी सही है बल्कि ऑडियंस को भी उसी तरह से स्वीकार करना चाहिए। लेकिन सूचनाओं के स्रोतों के विस्तार, उनके बीच आपसी प्रतियोगिता और नए माध्यमों ने इस समझदारी को एक चुनौती पेश की है। अब मुख्यधारा का कोई पत्रकार किसी घटना को मनमाने या आधे-अधूरे तरीके से रिपोर्ट कर बच नहीं सकता।

यही नहीं, मुख्यधारा के मीडिया के लिए अब किसी घटना, मुद्दे, समस्या और विचार को नजरअंदाज करना या ब्लैकऑउट करना भी संभव नहीं रह गया है। दुनियाभर में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है जब मुख्यधारा के मीडिया द्वारा समाचारों के ब्लैकऑउट या उन्हें तोड़मरोड़ कर पेश करने को नागरिक पत्रकारों ने वैकल्पिक माध्यमों-ब्लॉग्स आदि के जरिए चुनौती दी है। नागरिक पत्रकारों ने जानेमाने समाचार संगठनों के प्रोफेशनल पत्रकारों की रिपोर्टों और लेखों में तथ्यगत अशुद्धियों से लेकर उनके पूर्वाग्रहों, राजनीतिक झुकावों और व्यावसायिक दबावों को न सिर्फ उजागर किया है बल्कि उसे सार्वजनिक चर्चा और विचारविमर्श का मुद्दा बनाने में सफलता हासिल की है।

इराक के मामले में अमरीकी समाचार माध्यमों की भूमिका पर सबसे पहले इन्हीं नागरिक पत्रकारों ने सवाल खड़े किए और उन्हें चुनौती दी। यह भी एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि इराक के बारे में सबसे अधिक तथ्यपूर्ण और आंखे खोल देनेवाली रिपोर्टें मुख्यधारा के समाचार माध्यमों के जरिए नहीं बल्कि एक नागरिक पत्रकार दाहर जमाल के ब्लॉग्स के जरिए सामने आई हैं। इस मायने में नागरिक पत्रकारिता मुख्यधारा के मीडिया के लोकतांत्रिकरण के आंदोलन का हिस्सा है। उसने आम पाठकों/दर्शकों/श्रोताओं को सक्रिय बनाया है और उनके अंदर मीडिया की एक समझ भी पैदा की है। इस सक्रियता और समझ के साथ ये पाठक/दर्शक/श्रोता मुख्यधारा के मीडिया में हस्तक्षेप कर रहे हैं और अपने और अपने सरोकारों के लिए जगह की मांग कर रहे है।

नागरिक पत्रकारिता बनाम 'पीपुलराज्जी': गेटकीपरों की भूमिका और चुनौतियां

लेकिन नागरिक पत्रकारिता की राह इतनी आसान नहीं है। मुख्यधारा के मीडिया ने इसे अपने अंदर समाहित कर लेने के लिए कोशिशें शुरू कर दी हैं। सीएनएन-आईबीएन और दूसरे टीवी चैनल जिस नागरिक पत्रकारिता को प्रोत्साहित कर रहे हैं, वह नागरिक पत्रकारिता की लोकतांत्रिक भावना और संघर्ष को जगह देने के बजाय उसके रूप या फार्म को जगह देने की कोशिश है। कहने का तात्पर्य यह है कि चैनल के अपने अलोकतांत्रिक चरित्र और स्वरूप में बदलाव के बजाय प्रतीकात्मक तौर पर कुछ नागरिकों की ओर से किसी बड़ी घटना या मामले की कोई एक्सक्लूसिव वीडियो या फिल्म फुटेज भेजने और उसे चैनल पर दिखाने से कोई खास फर्क नहीं पड़नेवाला है।

दरअसल, एक मायने में मुख्यधारा के समाचार चैनल अपने ऑडियंस को एक खास तरह की नागरिक पत्रकारिता के लिए प्रेरित कर रहे हैं जिसमें उनका जोर ऐसे अजीबोगरीब, अटपटे और चौंकानेवाले वीडियो क्लिप पर होता है जिसका कोई सार्वजनिक महत्व नहीं है। वे एक तरह से अपने दर्शकों को उन्हीं समाचारीय मानदंडों और सोच के अनुरूप खबरें और वीडियो भेजने के लिए तैयार कर रहे हैं जिसके प्रतिरोध में नागरिक पत्रकारिता खड़ी हुई है। इसका नतीजा यह हुआ है कि चैनलों को दर्शकों से इस तरह के एक्सक्लूसिव लेकिन अटपटे फुटेज मिल रहे हैं जिनका सार्वजनिक जीवन से कोई खास ताल्लुक नहीं है। अगर बहुत हुआ तो उनका संबंध कुछ सार्वजनिक समस्याओं से है लेकिन वे कहीं से उन सार्वजनिक नीतियों को निशाना नहीं बनाते जो नागरिक पत्रकारिता के एजेंडे पर होना चाहिए। चाहे वह मुंबई की जबरदस्त बारिश और बाढ हो या दिल्ली में पहाड़गंज में बम विस्फोट या फिर दिल्ली में ओबराय फ्लाई ओवर पर कार में आग जैसी कई घटनाओं की तस्वीरें चैनलों पर दर्शकों द्वारा भेजी गई वीडियो क्लिप के जरिए ही दिखाई गयीं।

लेकिन इससे चैनलों के समाचार प्रस्तुति में मौजूद लोकतांत्रिक घाटे पर कोई असर नहीं पड़ा बल्कि उल्टे चैनलों ने नागरिक पत्रकारों को बड़ी चतुराई के साथ इस्तेमाल कर लिया। असल में, हाल के वर्षों में संचार माध्यमों की तकनीक में विकास और उनके व्यापक प्रसार के बाद आम लोगों के हाथ में भी ऐसे उपकरण जैसे कैमरा फोन, हैंडीकैम आदि आ गए हैं जो अब तक चैनलों के पास थे। आमतौर पर जब कोई बड़ी घटना या दुर्घटना होती है तो संयोगवश बहुतेरे दर्शक वहां मौजूद होते हैं और उनमें से कई अपने कैमरा फोन या हैंडीकैम से उसकी तस्वीरे भी उतारने में कामयाब हो जाते है। चूंकि अचानक होनेवाली घटनाओं के समय चैनलों के पत्रकारों और कैमरा टीमों का वहां होना संभव नहीं होता है तो उस समय इस तरह की एमेच्योर वीडियो फुटेज की भी मांग बढ़ जाती है। यह भी नागरिक पत्रकारिता का एक रूप है लेकिन इसमें नागरिक के विचारों और सरोकारों की भूमिका कम और घटनात्मक संयोग की भूमिका अधिक है।

इसी का एक और पहलू यह है जिसमें लोग अपने कैमराफोन या हैंडीकैम के जरिए जानेमाने लोगों यानी सेलिब्रीटीज की तस्वीरे कई बार चोरी-छिपे और कई बार खुलकर उतारते हैं और सेलिब्रीटीज के ऑब्सेशन से ग्रस्त चैनल उन्हें खुशी-खुशी दिखाते भी है। लेकिन यह नागरिक पत्रकारिता का विकृत रूप है। इसीलिए इसे पैपराज्जी की तर्ज पर पीपुलराज्जी भी कहा जाता है। इसमें सेलिब्रीटीज के निजी जीवन में तांकझांक की कोशिश को साफ देखा जा सकता है। इस तरह की विकृत पत्रकारिता का एक चर्चित मामला कुछ साल पहले तब सामने आया था जब कुछ चैनलों ने कैमरा फोन से खींचे गए दो मुंबइया फिल्मी सितारों- करीना और शाहिद कपूर के किसी होटल में चुंबन लेते दृश्य को जोरशोर से दिखाया था।

निश्चय ही, यह नागरिक पत्रकारिता नहीं है। इस मायने में करीना और शाहिद कपूर के प्रकरण को चैनलों पर दिखाने का विरोध बिल्कुल ठीक था। उस घटना के बाद इक्का-दुक्का प्रसंगों को छोड़कर आमतौर पर मीडिया ने ''पीपुलराज्जी पत्रकारिता`` को बढ़ावा नहीं दिया। लेकिन हाल के दिनों में समाचार माध्यमों के बीच बढ़ती व्यावसायिक प्रतियोगिता ने ऐसे वीडियो क्लिपों की मांग को बढ़ा दिया है जिसमें सेलीब्रिटी के निजी जीवन में तांक-झांक करने से लेकर अजीबोगरीब और हैरत अंगेज कारनामों को दिखाया गया हो। एक प्रमुख चैनल ने हाल में एक कैमरा फोन से खींची गई एक ऐसी कार की तस्वीरें घंटों दिखाईं जिसके बारे में दावा किया गया कि वह कार बिना ड्राइवर के चल रही है। जबकि सच्चाई यह थी कि चैनल को पहले से पता था कि यह एक ट्रिक है और उसे दिखाकर दर्शकों को मूर्ख बनाया जा रहा है। यहां यह उल्लेख करना भी जरूरी है कि उस चैनल ने वह वीडियो क्लिप काफी भारी भरकम रकम चुकाकर खरीदी थी।

यह एक तरह से अपने दर्शकों को भ्रष्ट बनाने की भी कोशिश है। यह नागरिक पत्रकारिता के लिए एक चुनौती है। इस मामले में नागरिक पत्रकारों के साथ-साथ चैनलों को भी अतिरिक्त सतर्कता बरतने की जरूरत है। खासकर समाचार माध्यमों में यही पर गेटकीपरों यानि संपादकों की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्हें न सिर्फ नागरिकों द्वारा भेजे गए ऐसे वीडियो फुटेज को हतोत्साहित करना चाहिए बल्कि नागरिकों की ओर से मिलनेवाले हर वीडियो फुटेज/खबर की पूरी छानबीन और जांचपड़ताल करनी चाहिए। एक्सक्लूसिव फुटेज चलाने की हड़बड़ी में चैनल के गेटकीपरों द्वारा पारंपरिक पत्रकारिता के सिद्धांतों को कतई अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन ऐसा लगता है कि मुख्यधारा के समाचार संगठन प्रोफेशनल पत्रकारिता के उसूलों को भी भूल गए हैं।

नागरिक पत्रकारिता : संभावनाएं और चुनौतियां

हालांकि भारत में नागरिक पत्रकारिता की अभी उस तरह से शुरूआत नहीं हुई है जैसे दुनिया के कई देशों में उसने अपनी अलग पहचान बनाई है। इसके बावजूद भारत में नागरिक पत्रकारिता की संभावनाएं असीमित हैं। निश्चय ही इन संभावनाओं के द्वार खोलने के लिए पहले संगठित नागरिक समूहों और आंदोलनो को आगे आना पड़ेगा। यह सचमुच अफसोस और चिंता की बात है कि देश में नागरिक आंदोलनो और नागरिक समाज के संगठनो के विस्तार के बावजूद उनकी चिंता और कार्यक्रमों के दायरे में व्यापक समाज के साथ सूचनाओं के आदान-प्रदान और अपने मुद्दों और सरोकारों को एजेंडे पर लाने की वैसी कोशिश नहीं दिखाई पड़ती है जिसकी जरूरत काफी अरसे से महसूस की जा रही है।

निश्चय ही, नागरिक आंदोलनो और संगठनों को इस ओर ध्यान देना पड़ेगा। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में ऐसी कुछ पहलकदमियां हुई हैं लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। इस सिलसिले में सूचना के अधिकार ने नागरिक पत्रकारिता के लिए नए रास्ते खोल दिए है। दुनिया के और देशों में नागरिक पत्रकारिता को लेकर किए जा रहे प्रयोगों से भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है। जगह की कमी के कारण यहां उन सब की चर्चा तो संभव नहीं है लेकिन कुछ ऐसे प्रासंगिक उदाहरणों की चर्चा जरूरी है जिनको हम एक मॉडल मान सकते हैं :

दक्षिण कोरिया में ''ओहमाइन्यूज`` नागरिक पत्रकारिता का व्यावसायिक रूप से भी एक सफल उदाहरण है। फरवरी 2000 में ओह युन-हो ने इसकी स्थापना की थी और इसका ध्येय वाक्य है- ''हर नागरिक एक रिपोर्टर है।`` ''ओहमाइन्यूज`` की कुल सामग्री में से लगभग 80 फीसदी उन हजारों नागरिक पत्रकारों से आती है जो देश के कोने-कोने में और दुनिया के विभिन्न देशों में फैले हुए है और 20 प्रतिशत सामग्री इसमें काम करनेवाले प्रोफेशनल पत्रकारों द्वारा लिखी जाती है। ''ओहमाइन्यूज`` के नागरिक पत्रकार वास्तव में आम नागरिक है और पत्रकारिता उनका पेशा नहीं है। लेकिन वे अपने इलाके और आस-पास की समस्याओं और घटनाओं पर रिपोर्ट और टिप्पणियां लिखते हैं।

नागरिक पत्रकारिता का एक और रूप वे ब्लॉग्स हैं जिनमें व्यक्तिगत से लेकर विभिन्न क्षेत्रों और व्यवसायों की चिंताओं और सरोकारों को उठाया जा रहा है, उन पर चर्चा हो रही है और कई बार सामूहिक कार्रवाइयां भी हो रही है। ऐसे बहुतेरे ब्लॉग भारत में भी सक्रिय हैं। उनके बीच नेटवर्किंग बढ़नी चाहिए और आपसी संवाद को प्रोत्साहित करना चाहिए।

मुख्यधारा के मीडिया में नागरिक पत्रकारिता का हस्तक्षेप कई रूपों में सामने आ रहा है। उसका एक रूप तो यह है कि समाचार माध्यम अपने वेबसाइट पर कुछ रिपोर्टों, लेखों, संपादकीयों और खबरों को पाठकों की टिप्पणियों के लिए खोल रहे हैं। पाठक इन रिपोर्टों आदि को पढ़ने के बाद उस पर अपनी टिप्पणी दर्ज कर सकते हैं और साथ ही अन्य पाठकों की टिप्पणियों पर भी चर्चा कर सकते हैं। इसके अलावा समाचार माध्यम अपने पाठको को इन रिपोर्टों आदि की रेटिंग करने के लिए भी कह रहे हैं।

मुख्यधारा के समाचार माध्यमों में इसका एक और रूप इस तरह भी सामने आ रहा है जिसमें समाचार माध्यम अपने पाठको को अपने किसी प्रोफेशनल रिपोर्टर या लेखक की खबर, रिपोर्ट और फीचर पर न सिर्फ टिप्पणी करने के लिए बल्कि उसमें कुछ नयी जानकारियां या सूचनाएं जोड़ने के लिए कह रहे हैं। इसके जरिए समाचार माध्यम दरअसल अपने पाठको और दर्शकों को यह मौका दे रहे हैं कि वे किसी घटना या मसले पर उसकी कवरेज को और व्यापक और सघन बना सकें।

तात्पर्य यह कि नागरिक पत्रकारिता में असीमित संभावनाएं हैं। लेकिन उसके सामने चुनौतियां भी कम नहीं है। मुख्यधारा के मीडिया की सबसे बड़ी शिकायत ही यह है कि नागरिक पत्रकारिता, पत्रकारिता के कई बुनियादी सिद्धांतों जैसे वस्तुनिष्ठता, तथ्यपरकता, निष्पक्षता और संतुलन आदि का ध्यान नहीं रखती है। इसमें कुछ हद तक सच्चाई है। कई बार कुछ पाठक ब्लॉग्स आदि में न सिर्फ अश्लील टिप्पणियां करते हैं बल्कि व्यक्तिगत आक्षेप पर भी उतर आते है। इस तरह की प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाने के लिए नागरिक पत्रकारिता में सक्रिय गंभीर और ईमानदार लोगों के अलावा गेटकीपरों को आगे आना पड़ेगा। लेकिन इस सब के बावजूद नागरिक पत्रकारिता को अब रोक पाना संभव नहीं है।

भारत में साइबर पत्रकारिता का विकास


सूचना से अधिक महत्वपूर्ण सूचनातंत्र है।” ”माध्यम ही संदेश है” नामक पुस्तक में प्रसिद्ध मीडिया विशेषज्ञ मार्शल मैक्लूहन की लिखी उक्त उक्ति आज के दौर में नितान्त प्रासंगिक और समसामयिक है। यह सार्वकालिक सत्य है कि सूचना में शक्ति है। पत्रकारिता तो सूचनाओं का जाल है, जिसमें पत्रकार सूचनाएँ देने के साथ-साथ सामान्य जनता को दिशा निर्देश देता है। उनका पथ प्रदर्शन करता है। एक प्रकार से कहा जाए तो पत्रकारिता वह ज्ञान चक्षु है जिसके माध्यम से पत्रकार अपने विचारों को व्यक्त करता है।
प्रत्येक व्यक्ति को दूसरों के बारे में जानने की खास दिलचस्पी होती है और इसके लिए माध्यम सदा ही उपलब्ध रहे हैं। पहले अखबार, फिर टी. वी. और अब इंटरनेट। आज खबरों को जानने का टेस्ट बदल गया है। पहले सिर्फ खबरें जान लेना महत्वपूर्ण होता था, बाद में उनके बहुआयामी पक्ष को जानने की ललक बढ़ी और आज तो खबरों का पोस्टमार्टम ही शुरु हो गया है। निश्चित रुप से इस प्रवृत्ति ने कहीं न कहीं लीक से हटकर कुछ नया करने को बाध्य किया है। इसका एक ताजातरीन उदाहरण है- वेब पत्रकारिता। एक उंगली की क्लिक और पूरी दुनिया आपके सामने। वह भी आपकी अपनी क्षेत्रीय भाषा में। एक जिज्ञासु मन को और क्या चाहिए। उसमें भी अगर टी. वी. और अखबार का आनंद बिना रिमोट का बटन दबाए मिल जाए या फिर अखबारों के पन्ने पलटकर शेष अगले पृष्ठ पर देखने से मुक्ति मिल जाए तो उपभोगवादी समाज के लिए इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है। शायद आरामतलबी के आदी हो चुके अभिजात्य वर्ग के लिए यह एक वरदान है। वेब पत्रकारिता आज मीडिया का सबसे तेजी से विकसित होने वाला माध्यम बन गया है। अखबारों की तरह वेब पत्र और पत्रिकाओं का जाल अंतर्जाल पर पूरी तरह बिछ चुका है। छोटे बड़े हर शहर से वेब पत्रकारिता संचालित हो रही है। छोटे बड़े सभी शहरों के प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक मीडिया भी वेब पर हैं। इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत में थोड़े ही समय में इसने बड़ा मुकाम पा लिया है। हालांकि इसे अभी और आगे जाना है।
आज मीडिया के पूरे बाजार की नजर हिंदी वेब पत्रकारिता पर है। एक अध्ययन के अनुसार योरोप के लोग सही खबरों के लिए समाचार चैनलों और समाचार पत्रों पर कम, ब्लॉगरों पर अधिक विश्वास करते हैं क्योंकि ब्लॉग के माध्यम से आप न सिर्फ दूसरों की विचारधारा से परिचित होते हैं वरन उस पर अपनी प्रतिक्रिया भी व्यक्त कर सकते हैं और अपने ब्लॉग के माध्यम से विश्व के कोने-कोने तक अपनी विचारधारा और लेखनी से लोगों को परिचित करा सकते हैं।
इसमें दोराय नहीं कि जितना अधिक पढ़ा जाए उतनी ही बहतर लेखन क्षमता का विकास होता जाता है। अंतरजाल और चिट्ठे इसमें भरपूर योगदान कर रहे हैं। हर विषय पर सामग्री प्राय: मुफ्त में उपलब्ध है।
मुद्रित पत्रिकाओं और साहित्य का दायरा आज अंतरजाल के सामने बहुत सीमित हो गया है क्योंकि इनका एक विशिष्ट पाठक वर्ग है किंतु अंतरजाल की कोई भौगोलिक सीमाएँ नहीं हैं और यह विश्व के कोने कोने में लगभग छपते ही तुरंत उपलब्ध हो जाता है। शायद यही इसकी जीत का मार्ग भी प्रशस्त कर रहा है। हर क्षण कुछ न कुछ नया जुड़ रहा है। अनेक पत्रिकाएँ हैं जो एक स्तरीय सामग्री संयोजित कर पठकों तक ला रही हैं। अंतरजाल पर हिंदी सामग्रियों की संख्या और स्तर दोनों ही बढ़ते जा रहे हैं। हिंदी साहित्य में सूचनाओं का यह माघ्यम प्राण फूँक सकता है। इस भागती दौड़ती दुनिया में सभी के पास समय का अभाव है। किसी को इतनी फुर्सत नहीं कि वह पहले बाजार जाकर पसंद की पत्रिका जगह जगह ढूँढे और फिर उसे खरीदे। आज इंटरनेट पर अभिव्यक्ति, अनुभूति, प्रवक्ता और सृजन गाथा जैसी ऑनलाइन पत्रिकाएँ हैं जिनसे कविताएँ, गज़लें, काहानियाँ आदि सभी विषयों पर प्रचीनतम और नवीनतम दोनों प्रकार की सामग्री बहुतायत में मिल जाती है।
तेजी से बदलती दुनिया, तेज होते शहरीकरण और जड़ों से उखड़ते लोगों व टूटते सामाजिक ताने बाने ने इंटरनेट को तेजी से लोकप्रिय किया है। कभी किताबें, अखबार और पत्रिकाएँ दोस्त हुआ करती थीं किन्तु आज का दोस्त इंटरनेट है क्योंकि यह दुतरफा संवाद का भी माध्यम है। लिखे हुए की तत्काल प्रक्रिया ने इसे लोकप्रिय बना दिया है। आज का पाठक सब कुछ इंन्स्टेंट चाहता है। इंटरनेट ने उसकी इस भूख को पूरा किया है। वेबसाइट्स ने दुनिया की तमाम भाषाओं में हो रहे काम और सूचनाओं का रिश्ता और संपर्क भी आसान बना दिया है। एक क्लिक पर हमें साहित्य और सूचना की एक वैश्विक दुनिया की उपलब्धता क्या आश्चर्य नहीं है। नयी पीढ़ी आज ज्यादातर सूचना या पाठय सामग्री की तलाश में वेबसाइट्स पर विचरण करती है।
भारत जैसे देश में जहाँ साहित्यिक पत्रिकाओं का संचालन बहुत कठिन और श्रमसाध्य काम है वहीं वेब पर पत्र-पत्रिका का प्रकाशन सिर्फ आपकी तकनीकी दक्षता और कुछ आर्थिक संसाधनों के माध्यम से जीवित रह सकता है। यहाँ यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि वेब पत्रिका का टिका रहना उसकी सामग्री की गुणवत्ता पर निर्भर करता है, न कि विपड़न रणनीति पर। जबकि मुद्रित पत्रिकाएँ और अखबार अपनी विपड़न रणनीति और अर्थ प्रबंधन के बल पर ही जीवित रह पाते हैं।
अखबारों के प्रकाशन में लगने वाली बड़ी पूंजी के कारण उसके हित और सरोकार निरंतर बदल रहे हैं। इस दृष्टिकोण से भी इंटरनेट ज्यादा लोकतांत्रिक दिखता है। वेबसाइट बनाने और चलाने का खर्चा भी कम है और ब्लॉग तो नि:शुल्क है ही। यहाँ एक पाठक खुद संपादक और लेखक बनकर इस मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। स्वभाव से ही लोकतांत्रिक माध्यम होने के नाते संवाद यहाँ सीधा और सुगम है। भारतीय समाज में तकनीक को लेकर हिचक के कारण वेब माध्यम अभी इतने प्रभावी नहीं दिखाई देते परंतु यह तकनीक सही अर्थों में निर्बल का बल है। इस तकनीक के इस्तमाल ने एक अंजाने से लेखक को भी ताकत दी है जो अपनी रचनाशीलता के माध्यम से अपने दूरस्थ दोस्तों को भी उससे जोड़ सकता है। वेब पत्रकारिता करने वालों का दायरा बहुत बड़ा हो जाता है। उनकी खबर एक पल में सारी दुनिया में पहुंच जाती है, जो कि अन्य समाचार माध्यमों के द्वारा संभव नहीं है। मीडिया का लोकतंत्रीकरण करने में वेब पत्रकारिता की मुख्य भूमिका दिखई देती है। विकसित तकनीक की उपलब्धता के कारण वेब पत्रकारिता को नित नये नये आयाम मिल रहे हैं। पहले केवल टेक्स्ट ही उपलब्ध हो पाता था परंतु अब चित्र, वीडियो व ऑडियो आदि भी बड़ी आसानी से विश्व के किसी भी कोने में भेजे जा सकते हैं।
एक सीमित संसाधन वाला व्यक्ति भी हाई स्पीड सेवाओं को आसानी से प्राप्त कर लेता है। अंतर्जाल पर उपलब्ध साहित्य और पत्रिकाओं को कहीं भी देखा जा सकता है। यहाँ तक कि काम के बीच बचे खाली समय का इस्तेमाल भी इस तरह से बखूबी हो सकता है जबकि मुद्रित पत्रिकाओं को साथ में लेकर चलना हर वक्त संभव नहीं होता।
जहाँ तक वेब पत्रकारिता में चुनौतियाँ और संभावनाओं का सवाल है, तो इसका भविष्य उज्ज्वल है और इसमें विकास की प्रबल संभावनाएँ हैं। देश में शिक्षा का स्तर बढ़ रहा है और शहरीकरण तेजी से हो रहा है। साथ ही तकनीक के विकास ने आज शहरों में हर घर में अपनी पहुंच बना ली है। तकनीक के लिए रोने वाला देश अब भारत नहीं रहा। कंप्यूटर, लैपटॉप, पामटौप घर घर की मूल आवश्यकता हो गयी है। तकनीक का रोना कहीं नहीं है। रोना उस पहल का है जहाँ अंतर्जाल भी हिंदी पत्रकारिता का इस्तंभ बन कर निकले।
आज अखबारों की तरह वेब पत्र और पत्रिकाओं का जाल अंतर्जाल पर पूरी तरह बिछ चुका है। इस बात से अनुमान लगाया जा सकता हे कि भारत में थोड़े ही समय में इसने बड़ा मुकाम पा लिया है, हालांकि समय अभी शेष है और इसे अभी बहुत दूर जाना है। भारत में अभी भी वेब पत्रकारिता की पहुंच प्रथम पंक्ति में खड़े लोगों तक ही सीमित है। धीरे धीरे मध्यम वर्ग भी इसमें शामिल हो रहा है। जहाँ तक अंतिम कतार में खड़े लोगों तक पहुंचने की बात है तो अभी यह बहुत दूर है।
भारत में वेब पत्रकारिता का विकास तो हो रहा है लेकिन कुछ समस्याएँ इसके तेजी से विकसित होने में आड़े आ रही हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसके लिए एक कंप्यूटर और इंटरनेट सेवा का होना आवश्यक है और इन पर कए अच्छी खासी लागत आती है। भारत की जनसंख्या का एक बड़ा भाग गाँवों में रहता है। शहरी बाजार की तुलना में ग्रामीण बाजार बहुत बड़ा है लेकिन गाँवों के समुचित विकास और पिछड़ेपन की वजह यहाँ का आर्थिक संकट है। साथ ही भारत में बिजली की समस्या गंभीर है। इसकी वजह से साइबर कैफे ठीक से कार्य नहीं कर पाते और लोग इसका समुचित लाभ नहीं ले पाते। वेब पत्रकारिता का सबसे ज्यादा फायदा विदेशों में रहने वाले लोग उठा रहे हैं। हिंदी फॉन्ट की समस्या भी हिंदी वेब पत्रकारिता के विकास को धीमा कर रही है। इसी समस्या की वजह से हिंदी ऑनलाइन वेब पत्रकारिता देर से शुरु हो पायी। हालांकि अब लगभग सभी ई अखबार अपने अपने संसकरण के साथ डाउनलोड करने के लिए फॉन्ट भी देने लगे हैं।
वेब पत्रकारिता के मार्ग में एक समस्या अलग से टीम न होने की भी है जिसकी वजह से मौलिकता का ईभाव रहता है और खबरें अपडेट नहीं हो पातीं। वेब पत्रकारिता को व्यापक बनाने के लिए आवश्यक है कि इसके लिए अलग से रिपोर्टर रखे जाएँ जो ऑनलाइन रिपोर्ट फाइल तैयार करें। वेब पत्रकारिता को स्थायी रूप से स्थापित करने के लिए इसमें मौलिकता का होना अति आवश्यक है।
इन कतिपय कमियों के बावजूद इतना निश्चित है कि आने वाले दिनों में वेब पत्रकारिता को वह सम्‍मान हासिल होगा जो प्रिन्ट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने पाया है। वेब पत्रकारिता जो व्यवहार में प्रिन्ट और इलेक्ट्रोनिक दोनों पत्रकारिताओं को समेटे हुए है और जिसकी गति के आगे बाकी सारी तकनीकें कहीं नहीं ठहरतीं, अन्य पत्रकारिताओं के लिए एक चुनौती से कम नहीं है। इसके विकास की गति बताती है कि जल्दी ही यह बाकी माध्यमों को पीछे छोड़ देगी। हाँ, इतना अवश्य है कि जहाँ कंप्यूटर या इंटरनेट की सुविधा ही न हो, बिजली या वैसी उर्जा की व्यवस्था न हो, मॉडम न हो वहाँ यह प्रणाली नहीं जा सकती। पर जहाँ ये सुविधाएँ हैं वहाँ वेब पत्रकारिता के लिए अलग से कुछ ज्यादा करने की जरुरत नहीं होती। एक बार ये सुविधाएँ मिल जाने पर काम इतना सस्ता, सुविधाजनक ओर तेज होता है कि अन्य माध्यमों पर जाने की इच्छा ही नहीं होती। वेब पत्रकारिता में संभावनाएँ इस दृष्टि से और भी प्रबल हो जाती हैं कि प्रिन्ट मीडिया की किसी भी खबर के लिए अखबार में कम से कम आठ घन्टे तक समाचारों के लिए इंतजार करना पड़ता है, दूसरी ओर इलेक्ट्रोनिक मीडिया में समय को लेकर कोइ पाबंदी नहीं है। ऐसे में समय और उपलब्धता के साथ ही तात्कालिकता के लिहाज से मीडिया का यह माध्यम ज्यादा कारगर साबित हो सकता है।
और, अभी चाहे मात्र प्रसार पाने की अभिलाषा हो या इस नये धंधे में उतरने की संभावनाएँ परखने की इच्छा हो, आज शायद ही कोइ अखबार, पत्रिका, रेडियो या टी. वी. चैनल होगा जो वेब पर उपलब्ध न हो और वह भी लगभग मुफ्त। टी. वी. पर विचार पक्ष कमजोर पड़ जाता है और प्रिन्ट में दृश्य श्रव्य की अनुपस्थिति जैसी कमियाँ खटकती हैं लेकिन वेब माध्यम इन दोनों ही कमियों को एक साथ पूरा करता है। यह पढ़ने की सामग्री भी दे सकता है और चलती तस्वीरें और आवाज भी। इसमें पाठक या दर्शक की भगीदारी किसी भी अन्य माध्यम की तुलना में ज्यादा होती है। इसमें काइ संदेह नहीं कि वेब पत्रकारिता समाचार माध्यमों के लिए एक गंभीर चुनौती के रूप में सामने आ रही है, खासकर मुद्रित माध्यमों के लिए। हो सकता है कि इलेक्ट्रोनिक माध्यम मुद्रित माध्यमों को बहुत अधिक नुकसान न पहुंचा पाये हों लेकिन यह माध्यम मुद्रित व इलेक्ट्रोनिक दोनों के लिए चुनौती साबित हो रहा है। जिस तरह से वेब पत्रकारिता में राष्ट्रीय या बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ निवेश कर रही हैं और वेब पत्रकारिता ने जिस तरह अपनी प्ररंभिक अवस्था में ही अपनी खबरों को विशिष्ट रूप देना प्ररंभ कर दिया है वह परंपरागत माध्यमों के लिए खतरे की घंटी है। इसका उदाहरण तहलका डॉट कॉम की मैच फिक्सिंग और रक्षा सौदों में घूसखोरी की कवरेज को कहा जा सकता है। अभी तक विशिष्ट समाचारों के लिए इलेक्ट्रोनिक माध्यम भी अखबारों आदि पर निर्भर थे लेकिन अब विशेष खबरों के लिए आम पाठक वर्ग तथा परंपरागत माध्यम वेब पत्रकारिता के मोहताज हो जायेंगे।
संक्षेप में आज के आपाधापी के युग में रफ्तार का बहुत महत्व है और वेब पत्रकारिता उस पैमाने पर खरी उतर रही है। वो पाठकों को हर जानकारी उस जगह और उस वक्त सुलभ कराती है जिस जगह और जिस वक्त वे उसकी मांग करते हैं। इस प्रकार वेब पत्रकारिता अन्य माध्यमों को सशक्त चुनौती दे रही है। उसके विकास की अपार संभावनाएँ हैं। वस्तुत: वेब पत्रकारिता ने ”वसुधैव कुटुम्बकम्” के नारे को चरितार्थ कर दिया है।

पॉपुलर कल्चर और नया नज़रिया


हमारे समाज में जिस तरह पापुलर कल्चर के प्रति अनालोचनात्मक प्रचार चल रहा है और प्रगतिशीलों के द्वारा जिस तरह पापुलर कल्चर की उपेक्षा की जा रही है वह चिन्ता की चीज है। पापुलर कल्चर को लेकर प्रगतिशीलों में दो तरह का नजरिया रहा है,पहला नजरिया यह मानकर चलता है कि पापुलर कल्चर के अंदर जाकर काम करो,उसके विधा और मीडिया रुपों का इस्तेमाल करो और समाज में अच्छे विचारों और मूल्यों का प्रचार करो। यानी पापुलर कल्चर को प्रचार से ज्यादा वे महत्व नहीं देते।

दूसरा नजरिया पापुलर कल्चर को आए दिन धिक्कारता रहता है। धिक्कार और पूजा के परे जाकर आलोचनात्मक नजरिए से पापुलर कल्चर के तमाम पहलुओं पर गंभीरता के साथ विचार किया जाना चाहिए। बोर्द्रिओ का मानना है कि सांस्कृतिक अभ्यासों और सांस्कृतिक परंपरा के ज्ञान का गहरा संबंध शिक्षा और सांस्कृतिक अभिरुचि के स्तर के साथ है। इसमें शिक्षा की निर्णायक भूमिका है। शिक्षा के द्वारा ही सांस्कृतिक अभ्यास और आदतें निर्मित की जाती हैं। इसके अलावा सांस्कृतिक आकांक्षाएं और इच्छाएं भी शिक्षा के कारण पैदा होती हैं। किसी व्यक्ति में किस तरह की सांस्कृतिक इच्छा और आकांक्षाएं हैं ,यह इस बात से तय होगा कि उसकी किस तरह की शिक्षा हुई है और किस तरह के सांस्कृतिक अभ्यासों से गुजरा है। संस्कृति लोगों को प्रेरणा प्रदान करे इसके लिए जरुरी है कि उन्हें शिक्षा प्रदान की जाय। इसके अलावा दूसरा महत्वपूर्ण तत्व है परिवार। व्यक्ति किस तरह की पारिवारिक पृष्ठभूमि से आता है और परिवार उसके अंदर किस तरह का सांस्कृतिकबोध निर्मित करता है।

संस्कृति के निर्माण में शिक्षा के बाद दूसरा सबसे बड़ा संस्थान है परिवार। शिक्षा और परिवार ये दो तत्व ऐसे हैं जो व्यक्ति के लिए सांस्कृतिक संपदा पैदा करते हैं। मसलन् एक व्यक्ति है जो बेहतरीन सांस्कृतिक पारिवारिक पृष्ठभूमि से आता है,बेहतर शिक्षा पाता है,दूसरा व्यक्ति भी उसी आर्थिक स्तर के परिवार से आया है और समान रुप से बेहतर शिक्षा पाता है,किंतु उसके पास पारिवारिक-सांस्कृतिक संपदा नहीं है ,ऐसे में दोनों का सांस्कृतिकबोध एक ही स्तर का नहीं होगा। क्योंकि पहले वाले व्यक्ति के पास सांस्कृतिक पृष्ठभूमि है जबकि दूसरे के पास इसका अभाव है। परिवार की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का व्यक्ति के सांस्कृतिक परिवेश के निर्माण में गहरी भूमिका होती है। मजदूरवर्ग के परिवारों से आने वाले लोगों के पास किसी भी किस्म की सांस्कृतिक संपदा( कल्चर कैपीटल) नहीं होती। यही वजह है कि वे अपने बच्चों को किसी भी किस्म की संस्कृति नहीं सौंपते। वे किसी भी किस्म की वैध सांस्कृतिक गतिविधियों में भी सक्रिय नहीं होते। वे वैध सांस्कृतिक रुपों को भी समझने या उनक प्रशंसा करने में असमर्थ होते हैं। वे सांस्कृतिक तौर पर धमकाए जाते हैं अथवा अपमानित किए जाते हैं। अथवा वे संस्कृति के प्रति उदासीन रहते हैं।

संस्कृति के सम्मुखीन होने का अर्थ है अपनी चेतना के सम्मुखीन होना। यही वजह है कि मजदूरवर्ग के लोग संस्कृति से वंचित ही नहीं होते बल्कि वे जानते ही नहीं हैं कि वे वंचित हैं। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि मजदूरवर्ग के लोग संस्कृति की आकांक्षा तक से वंचित होते हैं। वे उसका मूल्य नहीं समझते, इस चीज को पहचान नहीं पाते कि उनका प्रेरक मूल्य कौन सा है। यही वह बुनियादी बिंदु है जिसके आधार पर पियरे बोर्दिओ ने '' सांस्कृतिक आवश्यकता'' (कल्चरल नीड्स)की धारणा पर जमकर हमला किया है। बोर्दिओ का मानना है कि ''सांस्कृतिक आवश्यकता'' हमारी स्कूली शिक्षा व्यवस्था पैदा करती है। इसी बुनियादी तत्व को केन्द्र में रखकर बोर्द्रिओ ने कहा है कि स्कूली शिक्षा व्यवस्था मजदूरवर्ग के हितों के खिलाफ काम कर रही है। स्कूली व्यवस्था हमारे समाज में व्याप्त असमानता को रेखांकित करने,उसे दूर करने में असमर्थ रही है। सामाजिक असमानता के जनतांत्रिक रेहटोरिक का हमने प्रचार ज्यादा किया है किंतु हमारी स्कूली व्यवस्था मूलत: मजदूरवर्ग विरोधी रही है। यही बात भारत के संदर्भ में भी लागू होती है। हमने अपनी स्कूली शिक्षा प्रणाली में धर्मनिरपेक्ष संस्कृति का जितना प्रचार किया है और उसका कोर्स बनाया है,बुनियादी तौर पर यह सारा प्रयास मजदूरवर्ग विरोधी है। मजदूरवर्ग के नजरिए से हमने स्कूल व्यवस्था को कभी देखने का प्रयास ही नहीं किया। जब एक बार हमने स्कूल व्यवस्था को सामाजिक असमानता के सामने बलि चढ़ा दिया तब बाकी सांस्कृतिक वैषम्य को दूर करना संभव ही नहीं होगा। ऐसे में संस्कृति को लेकर कमजोर समझ और सही समझ का भेद बना रहेगा।

सामाजिक सांस्कृतिक वैषम्य को दूर करने के पहले जरुरी है कि स्कूली शिक्षा को दुरुस्त किया जाय। उसे मजदूरवर्ग के नजरिए के अनुरुप तैयार किया जाय। तब ही सांस्कृतिक अंतरों को चुनौती दी जा सकती है,सांस्कृतिक बढ़त और पिछडेपन को समझा जा सकता है,उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। जो लोग पापुलर कल्चर के पक्ष में विभिन्न माध्यमों में आए दिन चालाकी और दिशाहीन ढ़ंग से हिमायत करते रहते हैं, वे ''संस्कृति पाने के लोकतांत्रिक अधिकार' से वंचित करने की प्रक्रियाओं की अनदेखी करते हैं। पापुलर कल्चर के पक्षधर यह तर्क देते हैं कि 'वे संस्कृति का जनतांत्रिकीकरण' कर रहे हैं। इस तर्क की बोर्द्रिओ ने तीखी आलोचना की है। बोर्द्रिओ ने सवाल किया है कि हमें सांस्कृतिक अभ्यासों की वैज्ञानिक अवधारणा का निर्माण करना चाहिए। जिससे उन परिस्थितियों को जान सकें कि आखिरकार किन परिस्थितियों में संस्कृति निर्मित होती है। इसके आधार पर ही संस्कृति के लोकतांत्रिकीकरण की यथार्थवादी और प्रभावशाली नीति निर्मित की जा सकती है। हमारे ज्यादातर संस्थानों की नीतियां मजदूरवर्ग विरोधी रही हैं। वे मजदूरवर्ग पर हमले करती रही हैं। हमारी कलादीर्घाओं, संग्रहालयों, सांस्कृतिक केन्द्रों में किस तरह के लोग आते हैं,ये वे लोग है जो पहले से ही सांस्कृतिक समर्थ हैं,ये मध्यवर्ग के लोग हैं। ये वे लोग हैं जो हमारी स्कूली व्यवस्था से आ रहे हैं,ये वे लोग हैं जो अलग से किसी खास सांस्कृतिक शिक्षा में तपकर नहीं आए हैं बल्कि सामान्य स्कूली शिक्षा ने ही इनके अंदर सांस्कृतिकबोध पैदा किया है। इसका अर्थ यह है कि स्कूली शिक्षा दीर्घकालिक सांस्कृतिकबोध निर्मित करती है। इससे एक बात सिध्द होती है कि स्कूली शिक्षा व्यवस्था की गतिविधियां हाशिए की गतिविधि नहीं है बल्कि केन्द्रीय गतिविधि है।
बोर्द्रिओ ने संस्कृति हासिल करने की प्रक्रिया के लोकतांत्रिकीकरण के सवालों ,आदर्श संस्कृति के सवालों आदि को उठाया है। यह वह संस्कृति है जो लोगों को आकर्षित करती रहती है। शिक्षा और राज्य के संस्थान संस्कृति के कल्ट को पैदा करने के केन्द्र बनकर रह गए हैं। ये उन्हीं लोगों को तैयार करते हैं जो संस्कृति में डूबे हुए हैं। संस्कृति के प्रति आस्थावान हैं। किंतु जिन लोगों के पास अब तक शिक्षा नहीं पहुँच पायी है और जिन्हें अब तक संस्कृति से वंचित रखा गया उन्हें कैसे शिक्षा और संस्कृति के करीब लाया जाय,इस ओर हमने अभी तक कोई प्रयास नहीं किया। किसी व्यक्ति को शिक्षित करने अर्थ यह नहीं है कि वह सांस्कृतिक तौर पर समर्थ बन गया है। शिक्षा स्वयं में सांस्कृतिक मूल्य पैदा नहीं करती। इससे सिर्फ इतना पता चलता है कि व्यक्ति शिक्षा में सफल रहा है।
वे ही लोग शिक्षा की सीमाओं का अतिक्रमण कर पाते हैं जो अकादमिक संस्कृति को आत्मसात् कर लेते हैं,जो अकादमिक संस्कृति के मुक्तिकामी संस्कारों को अपने अंदर समाहित कर लेते हैं। क्योंकि शिक्षा व्यवस्था में यही वह तत्व है जो गहराई में जाकर प्रभुत्वशाली वर्ग के मूल्यों को सहज ही आत्मसात करने के लिए तैयार करता है। आज अकादमिक जगत में अकादमिक अभ्यास और अकादमिक प्रतिवाद के बीच विवाद फैशन के रुप में दिखाई देता है। दूसरी ओर प्रामाणिक संस्कृति है जिसने अपने को स्कूल विमर्श से मुक्त कर लिया है। इसकी चंद सांस्कृतिक लोगों के लिए ही प्रासंगिकता रह गयी है। क्योंकि अकादमिक संस्कृति पर पूर्ण अधिकार ही स्कूल संस्कृति के परे जाने और पूरी तरह मुक्त संस्कृति को पाने की शर्त है।इसका अर्थ है कि संस्कृति को अकादमिक क्षेत्र के बाहर फेंक दिया गया है जबकि पहले संस्कृति को बुर्जुआजी और शिक्षा जगत सबसे ज्यादा मूल्यवान मानता था,उसे सम्मान देता था।
प्रामाणिक संस्कृति वह है जिसे हम संस्कृति का मुक्त क्षेत्र कहते हैं। जो स्कूल व्यवस्था में भी है और उसके परे भी जाती है। मसलन् ज्यों ही कोई नया सांस्कृतिक माल बाजार में आता है तो बुर्जुआजी उसे आत्मसात करने के लिए कहता है। यह वह माल है जो स्कूल व्यवस्था के बाहर है। मसलन् जॉज या सिनेमा है,ये शिक्षा के बाहर है और वैध सांस्कृतिक माल भी हैं। यह एक तरह की सांस्कृतिक वैधता भी प्रदान करता है। इन्हें वे लोग आत्मसात करते हैं जो वैध संस्कृति को आत्मसात करने की स्थिति में होते हैं। बोर्द्रिओ का मानना है कि सांस्कृतिक विषयों की प्रस्तुति और समाधान मूलत: व्यक्ति के निजी एटीट्यूट पर निर्भर करती है। इसे '' सांस्कृतिक अभ्यासों की चमत्कारिक विचारधारा'' की सैध्दान्तिकी के आधार पर ही हल किया जाता है। अभिजन का संस्कृति के साथ जिस तरह का रिश्ता होता है वही व्यवहार में फ्रांस में वर्चस्व बनाए हुए है। अभिजन का संस्कृति के प्रति नजरिया स्वाभाविक, अनारोपित, सांस्कृतिक रुपों का सहजजात प्रशंसक का दिखाई देता है। बोर्द्रिओ का मानना है कि अभिजन का नजरिया जिस तरह स्वाभाविक और सहजजात प्रशंसक का नजर आता है,वह वस्तुत: उसकी विशिष्ट सामाजिक अवस्था के कारण है। उच्चवर्गीय पारिवारिक जीवनशैली के कारण श्रेष्ठ संस्कृति को वह सहज ही आत्मसात कर लेता है। संस्कृति की अभिजन इसलिए प्रशंसा नहीं करता कि वह उसके लिए स्वाभाविक है,समझ में आती है। बल्कि उसका संस्कृति के साथ लंबा आंतरिक परिचय रहा है।

कलादीर्घाएं एक तरह से धार्मिक मंदिर के रुप में देखी जाती हैं। इनमें साइलेंस या चुप्पी को काफी महत्व दिया जाता है। वस्तुओं को स्पर्श न करने की हिदायत रहती है। ये परंपरागत कलादीर्घाएं संस्कृति की अभिजनवादी समझ को अभिव्यंजित करती हैं। अभिजन के अनुसार सौन्दर्यबोधीय अनुभव रहस्योद्धाटन के करीब होता है।इसे सच्ची प्रशंसा और समझ के आधार पर चंद लोग ही पा सकते हैं। संस्कृति को पाने वाले चंद अभिजन ही हो सकते हैं। बाकी सब इसके भक्त अथवा संस्कृतिधर्म के भक्त हो सकते हैं। सभी इस पवित्र संस्कृति के स्पर्श से रुपान्तरित कर सकते हैं,मुक्त कर सकते हैं।सभी राज्य के द्वारा चलायी जा रही सांस्कृतिक मुक्ति का आशीर्वाद पा सकते हैं।
इसके विपरीत बोर्द्रिओ ने नयी लोकतांत्रिक मुक्त कलादीर्घाओं की परिकल्पना पेश की। ये कलादीर्घाएं ज्यादा खुली ,स्वागत करने वाली और सहिष्णु हैं। साथ ही ये कला की शिक्षा देती हैं ,समझ बनाती हैं, और प्रशंसाभाव पैदा करने वाली हैं। क्योंकि परंपरागत कला दीर्घाएं सिध्दान्तत: कला की शिक्षा और समझ प्रदान नहीं करतीं।बल्कि ऐसा करने से इंकार करती हैं।

इन्टरनेट का इतिहास

इन्टरनेट का इतिहास 

2 सितम्बर 2009 को इन्टरनेट ने 40 साल पूरे कर लिए है। अब से 40 साल पहले यानि 2 सितम्बर 1969 को लें क्लेंरोक और यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफोर्निया लोस एंजेलेस की टीम ने इन्टरनेट से पहले अरपानेट को विकसित किया था, जिसकी शुरुवात दो कंप्यूटर को आपस में जोड़कर हुयी थी। सितम्बर को इस प्रयोग को एक कंप्यूटर के डाटा को दूसरे कंप्यूटर पर डाटा भेजने के लिए किया गया था। इसके बाद सन 1972 में रे तोमिल्सन नाम के साइंटिस्ट ने ईमेल के कांसेप्ट को पेश किया था और ईमेल एड्रेस के पहचान के लिए @ को चुना था। बाद में सन 1974 में विंट सर्फ नाम के साइंटिस्ट ने टी.सी.पी / आई.पी संचार प्रोटोकॉल को पेश किया था जिससे कई नेटवर्क्स को जोड़ने में मदद मिली और वास्तविक इन्टरनेट के विकास हुआ। बाद में सन 1993 में डोमेन नेम सिस्टम को चुना गया था जैसे की '.gov','.com','.edu' etc.  

सन 1988 में इन्टरनेट के इतिहास का एक दिन एसा भी रहा जब पहली बार इन्टरनेट वायरस मौरिस ने हजारों कंप्यूटर को इन्फेक्टेड किया था। बाद में सन 1990 में बेर्नेर्स ली नाम के साइंटिस्ट ने वर्ल्ड वाइड वेब की खोज की, जिसके कारण अलग अलग लोकेशन में फैले संस्थानों को जो़ड़ने में मदद मिली। इसके बाद सन 1993 में इन्टरनेट के इतिहास में मत्व्पूरण क्रांति तब आई थी जब मार्क अन्देर्सन नाम के साइंटिस्ट ने ग्राफिक्स और टेक्स्ट को एक साथ जोड़ने के लिए वेब ब्राउजर को विकशित किया था सन 1994 में मार्क अन्देर्सन और उनकी टीम ने कोम्मेरिसिअल वेब ब्राउजर विकशित करने के लिए नेट्स्केप नाम की एक कंपनी बनाई। इसके बाद सन 1999 में नापेस्टर नाम के साइंटिस्ट ने म्यूजिक फाइल शेरिंग सिस्टम को विकशित किया था जिसने आगे चलकर म्यूजिक इंडस्ट्री की दुनिया को बदल डाला सन 1998 में U.S.Government ने गूगल कार्पोरेशन की हेल्प से Domain name guideline to Internet Corporation for Assigned names and Number को विकसित किया था।

सन 2004 में मार्क ज़ुकेर्बेर्ग ने हारवर्ड यूनिवर्सिटी में फेसबुक बांयी थी और फिर बाद में सन 2005 में यू ट्यूब विडियो सेयरिंग की शुरुवात हुयी सन 2007 में एप्पल कारपोरेशन ने आईफोन टेक्नोलोजी को पेश किया और वायरलेस इन्टरनेट के माध्यम से करोडों लोगों को जोड़ा। सन 1999 में दुनिया में इन्‍टरनेट प्रयोग करने वालो की गिनती केवल 25 करोड़ थी 2002 में ये गिनती 50 करोड़ हो गईबाद में 2008 में ये गिनती 1.5 अरब तक हो गई थी आज इन्‍टरनेट का ही चमत्कार है की हम केवल एक माउस के क्लिक पर पूरी दुनिया की जानकारी ले सकते है। इसी इन्टरनेट के कारन ही मैं आज "साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन" के कांटेक्ट में हूँ जहाँ पर हम अपने विचारों को पेश कर सकते हैं और दूसरो के विचारोको जान सकते है।

Wednesday, March 2, 2011

film pre production

प्री-प्रोडक्शन

              प्री-प्रोडक्शन  में फिल्म कैसी होनी चाहिए?, फिल्म में क्या दिखाना है? , कैसे दिखाना है?, फिल्म बनाने से पहले सब बातो को जानना और उसके बारे में पता लगाना आदि मुद्दों पर बातचीत होती है, या कहा जाए तो योजना बनाए जाती है | प्री-प्रोडक्शन आशाओं का महासागर है | 


CONCEPT

      कंसेप्ट प्री-प्रोडक्शन का पहला भाग है |इसमें हम फिल्म को क्यूँ बनाना चाहते है ? फिल्म किस बारे में होगी ? दर्शको पर क्या असर छोड़ना चाहते है ?   आइडिया या विचार-सूत्र की कौंध –One line story से ही फिल्‍म निर्माण की शुरूआत होती है। उदाहरण देंखें तो कहा जा सकता है कि अंबानी घराने की गूंज गुरु फिल्‍म में दिखाई देती है। प्रोड्यूसर के सामने कोई ऐसे ही एक लाइन का आइडिया लेकर जाता है और फिल्‍म बनाने का सिलसिला आगे बढ़ता है।वृत्तचित्र में कंसेप्ट १०० शब्दों का लिखा जाता है |


TREATMENT

            यह एक प्रकार की व्याख्या होती है |फिल्‍म की कथा को पटकथा में ढाले बिना फिल्‍म निर्माण बड़ा जटिल होता है।पटकथा लेखक/निर्देशक द्वारा कहानी की पटकथा (सिनेमा के फिल्‍मांकन के अनुरूप) तैयार की जाती है।दरअसल पटकथा एक नहीं अनेक होती हैं जिसमें कैमरा परसन और अभिनेताओं समेत सभी जरूरी लोगों के लिए आवश्‍यकता के अनुरूप पटकथाएँ तैयार की जाती हैं।लेकिन, लोचा यह है कि पटकथा लिखने से ज्‍यादा सुनने और बताने की चीज बन जाती है। बॉलीवुड में पटकथा लिखने के बजाय या फिर उस पर हू-ब-हू चलने के बजाय वह लगातार बदलती रहती है।


SCRIPT

        इसी विचार-सूत्र को विकसित कर एक पूरी कहानी बनाई जाती है। निर्माता/निर्देशक द्वारा कहानी का चयन और परिवर्तन करने के बाद उसे स्‍वीकृत कर लिया जाता है। इसे हम फिल्‍म की कथा कह सकते हैं।


BUDGET

       निर्माता द्वारा बजट (Budgeting) पर बातचीत तथा बजट के अनुरूप पटकथा का समायोजन एवं बदलाव जरूरी होता है।वास्‍तव में देखें तो बजट पटकथा पर दबाव बनाता है जिसके चलते पटकथा से कई दृश्‍य काट-छाँट दिए जाते हैं।


SOUTING

              इसे हम लोकेट हंटिंग भी कहते है |  फिल्म को किस किस लोकेशन पर शूट करना है, इसमें ये सब  देखते है |
आज कल सारे डारेक्टर विदेशो में ज्यादा फिल्मे शूट करते है | इसकी यही वजह है की श्रोता अब एक चीज़ बार बार देख कर ऊब चूका है, वो अब हर बार कुछ नया देखना चाहता है  |





CREW

            इसमें एक टीम बना ली जाती है | टीम में कितने लोग होंगे | टीम में कौन क्या करेगा | फिल्म में कैमरा मेन कौन होंगा | मेक- अप मेन कौन होगा | जुनिओर आर्टिस्ट कौन होंगे | आदि फरहा खान  "शीला की जवानी"  की कोरिओग्रफर थी | अगर निर्देशक सही कोरिओग्रफर का चयन नहीं करते तो ये गाना फ्लॉप भी हो सकता था जबकि गाना हिट हुआ और फिल्म फ्लॉप हो गयी |


EQUIPMENT & SUPPLY

                 फिल्म को किन किन उपकरण की मदद से बनाया जाएगा |  कैमरा, लाइट, आदि कहा से hire किये जाएँगे | ये सब इसमें आते है |

Friday, February 25, 2011

ध्वनि-प्रवाह

रेडियो 
इलेक्ट्रोनिक मीडिया का रेडियो सस्ता व सुगम श्रय माध्यम है | इस यंत्र से दूर-दराज़ तक संदेश पहुँचाने की इस तकनीक का अविष्कार मारकोनी ने किया | जो बहुत लोकप्रिय सिद्ध हुआ | रेडियो ने संचार के क्षेत्र में एक बहुत बड़ी क्रांति पैदा की | सूचनाओ के अलावा गीत,संगीत,नाटक एव रूपक आदि सुन सकते है | रेडियो का श्रोता केवल दर्जी ही नहीं,बल्कि पानवाले से लेकर ड्राईवर या मजदूर तक है |
 रेडियो संचार-माध्यम के रूप में अंदर के लोगो का बाहरी लोगो से संप्रेषण कराता है | रेडियो शब्दावली में, सूचनाओ के संचार हेतु विधुत चुम्बकीय तरंगो के रूप में संकेतो की अंतरिक्ष के ज़रिये विसर्जन एव पहचान सम्मिलित है |
ध्वनि 
    रेडियो श्रव्य माध्यम है | दूर- दराज़ तक सन्देश पहुचाने वाला पोर्टबल उपकरण है | समाचार,गीत,नाटक,रूपक, आदि से प्रत्येक उम्र के मानव को अपनी ध्वनि से रिझाता है | कभी-कभी तो इसकी ध्वनि मानव को काम करने से रोक भी देती है | क्योंकि ध्वनि ही इस माध्यम के लिए सब कुछ है | ध्वनि ही दृश्य के निर्माण में सहायक होती है | घोड़ो की टाप,युद्ध क्षेत्र का वर्णन,पशु-पक्षियों की चेहचहाहट बारिश की बूंदे, दरवाज़े के खुलने की आवाज़, जोर से चीज़े पटकने,लाठी की ठक-ठक,गरम चाप की आवाज़,रेलवेस्टेशन के दृश्य आदि का आनंद रेडियो पर ध्वनि द्वारा ही लिया जा सकता है | फेड-आउट व फेड-इन रेडियो के आधारभूत व्याकरण है | यही उपकरण समय व दृश्य परिवर्तन ले लिए प्रस्तुत किये जाते है |
    ध्वनि प्रवाह :- 
 रेडियो एक दृश्यहीन माध्यम है | वह मात्र श्रव्य है यानि अंधों की दुनिया है लेकिन सर्वाधिक सुलभ साधन है | जनसाधारण तक और दूरदराज़ के प्रदेशों तक उसका सहज और सुगम है | इसमें ध्वनियाँ ही श्रोता तक संदेश पहुचाती है | श्रोता ध्वनियाँ के सहारे ही पूरे दृश्य की कल्पना कराता है | अत: रेडियो द्वारा निर्मित ध्वनि -संसार को तैयार करने के लिए विशेष कोशल उपेक्षित होता है | मधुर गंगाधर के शब्द में "रेडियो के लिए लिखना मात्र व्याकरण-नियंत्रित वाक्यों की रचना नहीं है | उसका अपना व्यक्तित्व होता है" |
 रेडियो में ध्वनि-प्रभाव का अपना महत्व होता है | ध्वनियाँ ही दृश्य-चित्र के निर्माण में सहायक होती है | घोड़ो की टापों का ध्वनि-प्रभाव युद्ध-प्रभाव युद्ध-क्षेत्र का कल्पना चित्र श्रोता के सम्मुख उत्पन्न कर सकती है तो पक्षीयों की चहक उगती भोर का दृश्य मानस-पटल पर खिंच सकती है | उल्लू  की चीखों से भयानक अँधेरी रातों का दृश्य पैदा हो सकता है और बारिश की बूंदों की आवाज़े मौसम के खुशनुमा का सहारा लेना पड़ता है उन्हें रेडियो कुछ ही ध्वनियों के रिकार्डो के माध्यम से सुगमता से प्रस्तुत कर सकने में समर्थ है | फेड-आउट (तेज़ से धीरे_धीरे मद्धिम ध्वनि) तथा फेड-इन  ( मद्धिम ध्वनि से धीरे धीरे तेज़ ध्वनि) रेडियो के आधारभूत व्याकरण हैं | एक तरह से ये "उपकरण " हैं जो समय की कमी अथवा दृश्य-परिवर्तन को सूचित करने के लिए प्रयुक्त किये जाते हैं |
  यह ध्वनि-प्रभाव तीन प्रकार के होते हैं :-

1. क्रिया ध्वनियाँ (ACTION SOUNDS):-
             दरवाज़े की दस्तकें,जोर से चीज़ें पटकने ,लाठी की ठक-ठक जैसी क्रियाओं की ध्वनियाँ का उपयोग भी रेडियो के पटकथाकार को करना होता है | चीजों को जोर से पटकना व्यक्ति के क्रोध का प्रतिक है | यदि बर्तन पटकने की आवाजों का चित्र उपस्थित किया जाए तो वातावरण के तनाव का एहसास श्रोता सरलता से कर सकते है | 

2.स्थल ध्वनियाँ (SETTING SOUNDS) :-
            किसी खास वातावरण का बोध करने वाली ध्वनियाँ स्थल ध्वनियाँ कहलाती हैं | उदाहरणर्थ, गरम चाय की आवाज़ें,कुली-कुली की पुकारें,गाड़ियों के आने की उद्घोषणाऍ आदि रेलवेस्टेशन प्लेटफार्म की गहमा-गहमी का दृश्य साकार कर देती हैं | इनका उपयोग बैकग्राउंड सैटिंग की तरह होती है |

3.प्रतिक ध्वनियाँ (SYMBOL SOUNDS) :- 
           नाटकीय स्थिति के सृजन के लिए विशेष प्रतीकात्मक ध्वनियों का उपयोग किया जाता है | हास्य नाटिकाओं के बीच ठहाकों, युद्ध-स्थल पर विस्फोटात्मक ध्वनियों तथा रोमांटिक दृश्यों में झरनों की ध्वनियों और पक्षीयों की चेहचहाटों का उपयोग भी रेडियो आलेख को सशक्त बनता है |      

Sunday, February 6, 2011


अप्रवासी भारतीयों पर फिल्मे

      इस अवधि की एक और विशेषता हिंगलिश फिल्मों का निर्माण रही | यह फिल्मे विदेशी तथा भारतीय सिनेमा का मिला जुला रूप रही | इन फिल्मों ने ना सिर्फ भारतीय जनता को बल्कि विदेशो में रह रहे अप्रवासी भारतीयों को प्रभावित किया | बेंड इट लाइक बेख्क्हम, मोंसून वेद्डिंग , मई नेम इस खान , कल हो ना हो , नमस्ते लन्दन आदि ऐसी ही फिल्मे है | 

2001 में आई  "कहो ना प्यार है"  उस साल की सबसे बड़ी हिट थी | हृतिक रोशन ने अपनी फ़िल्मी करियर की शुरुआत इसी फिल्म से की | इसमें उन्होंने डबल रोल में काफी अच्छा अभिनय किया |उसमे इन्होने रोहित और राज की भूमिका निभाई| रोहित जो आम इंसान होता है और राज एक प्रवासी भारतीय होता है जो कैनेडा में रहता है | अपने प्यार को पाने क लिए वो इंडिया तक चला आता है | एक्शन और रोमांस की मिली जुली इस फिल्म को लोगो ने बहुत सराहा |
     इसी वर्ष मानसून वेद्डिंग फिल्म भी भी आई जो एक शादी को  लेकर थी ,उस शादी में अलग अलग देशो से आ रहे प्रवासियों का बहुत अच्छे  ढंग से प्रस्तुत किया है |
       "कभी ख़ुशी कभी गम" 2001 में आई इसकी मुख्य भूमिका में शाहरख खान और अमिताब बचन है | घर में एक बेटे का अपनी मर्ज़ी से फेसला लेने पर उस पर क्या बीतती है, और वो गुस्से में आकर बेटे को घर से जाने को कहते है ,इसके बाद उसका बेटा कहा है क्या कर रहा है उसे कोई मतलब नहीं| तब उसका छोटा बेटा हृतिक रोशन उन्हें ढूँढने लन्दन जाता है जहाँ शाहरुख़ खान एक प्रवासी बन कर रह रहा होता है | ये फिल्म पूरे परिवार के लिए है और यह फिल्म 2001 की हिट फिल्म थी.|
    2002 में आई "मुझसे दोस्ती करोगे" इस फिल्म में कारन की भूमिका में हृतिक रोशन है | उनका परिवार इंडिया छोड़ कर लन्दन चला जाता है वह से इंडिया में नेट पर चेटिंग करता है पूजा से | लन्दन में रहते हुए भी उनके दिल में इंडिया बसा है | कारन शादी  करने के लिए लन्दन से परवार क साथ इंडिया आता है | इंडिया की संस्कृति बोहत अच्छे  ढंग से प्रस्तुत की है |
      "कल हो ना हो" 2003 शाहरुख़ खान की हिट फिल्म है | इसमें उन्होंने एक हार्ट पेशांत की भूमिका निभाई है |वोह अपना इलाज करवाने अमेरिका जाते है जहा उनकी मुलाकात नेना से होती है| वो एक अमेरिका की कालोनी है जहाँ प्रवासी भारतीय एक साथ रहते है | वो  खुद आखिरी पल गिन रहा है ज़िन्दगी के इस लिए सबको को खुश रहना और हसना गाने को कहता रहता है| उसे खुद को नेना से मोहब्बत हो जाती है मगर वोह नेना से नहीं कहता और नेना की शादी सैफ अली खान से करवा देता है और अंत में उसकी मौत हो जाती है | पूरी फिल्म फॅमिली के साथ देख सकते है |

  "रामजी लन्दनवाले " 2005 में आई इसमें माधवन ने एक खाने पकाने वाले का किरदार निभाया है | वो खाना पकाने के लिए एक व्यक्ति के बुलाने पर लन्दन जाते है पर जेसे ही वो वहां पोहंचते है उनकी मृत हो जाती है | वो परेशां इधरउधर घुमते है और फिर एक प्रवासी भारतीय के पास काम करने लगते है और लन्दन उन्हें रास नहीं आता वहा का कल्तुरे तहज़ीब उन्हें पसंद नहीं आती और वो वापस इंडिया आ जाते है अपने देश |फिल्म को काफी अच्छा प्रस्तुत किया है और माधवन की एक्टिंग भी शानदार रही |
          "नमस्ते लन्दन" 2007 में आई | मुख्य भूमिका में अक्षय कुमार और कैटरीना कैफ थी |इस फिल्म को लोगो ने बहुत पसंद किया | इसमें भारतीय संकृति और परंपराओ को बोहत अच्छे से प्रस्तुत किया है | ये फिल्म हिट हुए इसमें इंडिया के लड़के की शादी लन्दन में पली बड़ी लड़की से इंडिया में लाकर शादी करवा देता है पर वोह वहां खामोश रहती है और वापस लन्दन आकर उस शादी को एक मज़ाक बताती है | इस फिल्म में किस तरह से अब उससे समझेंगे ये देखने लायक है |
        "सिंह इस किंग " 2008 में आइ| ये फिल्म उस साल की हिट फिल्म थी | इस फिल्म में पंजाब के एक बुडे बाप के पुत्र ऑस्ट्रेलिया में रह रहे है | फुल कॉमेडी के साथ इस फिल्म को बोहत अची तरह से प्रस्तुत किया गया है | इसमें लकी इंडिया से ऑस्ट्रेलिया अपने दोस्तों को वापस अपने वतन लाने के लिए जाता है और खुद वही पर काफी दिन तक रुक जाता है |और आखिर में वोह कामयाब होता है अपने दोस्तों को वापस उनके घर लेन में |फिल्म का गाना ""तुझे घोड़ी किन्ने चदय" काफी मशहूर हुआ
       "न्यू योंर्क" 2009 में आई |इस फिल्म में 11 सितम्बर पे जो हमला हुआ था, उससे क्या बीती अमेरिका में रहने वाले भारतीयों पर और उससे परेशान होकर लोगो ने क्या कदम उठाए |काफी कुछ  प्रस्तुत किया है |
"मई नेम इज खान " 2010 में आई | इस फिल्म को भारत में तो पसंद किया गया पर बहार देशों में कुछ ज्यादा ही पसंद किया गया |इस फिल्म में शाहरुख़ खान ने रिजवान खान की भूमिका निभाई है, जो दिमागी रोगी है | उसका छोटा भाई उसे अमेरिका ले जाता है और अपनी पत्नी से उसका इलाज भी करवाता है जो एक डॉक्टर है | उसे मंदिरा (काजोल) से प्यार हो जाता है और शादी भी हो जाती है |एक मुस्लिम नाम का होना अमेरिका में साब भारतीयों के साथ ग़लत हो रहा है अपने नाम को लेकर रिजवान को भी अमेरिका में काफी परेशानियों का सामना करना पढता है |सबसे परेशां होकर वो थान लेता है की में अमेरिका के प्रेसिडेंट से मिलूँगा और और वोह सफ़र पर निकल पढता है |