Sunday, February 6, 2011

nri filme 2001 2010

कहो ना प्यार है , जोरू का गुलाम , मानसून वेद्डिंग, कभी ख़ुशी कभी ग़म, दिल चाहता है , अजनबी , रहना है तेरे दिल में , आवारा पागल दीवाना , बॉलीवुड होलीवुड , मेरे यार की शादी है , मुझसे दोस्ती करोगी, शक्ति , कल हो ना हो , में प्रेम की दीवानी हूँ , आउट ऑफ़ कंट्रोल, हम तुम , फ़िदा , ग्रीन कार्ड फॉरएवर, आई प्रऑड तो बी एन इंडियन , गरम मसाला , सलाम नमस्ते ,सरकार ,दीवाने हुए पागल , जो बोले सो निहाल ,रामजी लन्दन वाले , विरुद्ध , कृष , रंग दे बसंती , कभी अलविदा ना कहना , भागम भाग ,फॅमिली ,रोकी , ॐ शांति ॐ , पार्टनर , हे बेबी , नमस्ते लन्दन ,आवारापन , वैलकम, सिंह इस किंग,  दोस्ताना ,सरकार राज , युवराज जन्नत , बचना ए हसीनो , लव आज कल , न्यू योर्क , ब्लू ,दिल्ली ६ , आल दा बेस्ट , मई नेम इस खान , हाउस फुल , काइट, राजनीति ,क्रूक , गुज़ारिश ,रोबोट ......   

10 best fil fo r year

कहो ना प्यार है , मोहब्बतें , मिशन कश्मीर , जोश ,रिफूजी  बादल, पुकार, धड़कन ,हरदिल जो प्यार करेगा, मेला , ग़दर एक प्रेम कथा , कभी ख़ुशी कभी गम ,लगान, इंडियन ,दिल चाहता है , अजनबी , चोरी चोरी चुपके चुपके, मुझे कुछ कहना है , जोड़ी नम्बर 1  , एक रिश्ता , देवदास ,राज़ , कांटे , ऑंखें , हम तुम्हारे है सनम , रिश्ते , आवारा पागल  दीवाना , साथिया, दीवानगी, कंपनी , कोई मिल गया , कल हो ना हो ,दा हीरो ,बागबान , मुन्ना भाई एम.बी .बी . एस , एल .ओ .सी कारगिल , चलते चलते , क़यामत, अंदाज़ ,  मैं प्रेम की दीवानी हु , वीर ज़ारा , मैं हु ना , मुझसे शादी करोगी , धूम , खाकी , लक्ष्य , हम तुम ., मस्ती , हलचल , मर्डर , नो एंट्री , बंटी और बबली , मंगल पांडे , मैंने प्यार क्यूँ किया , गरम मसाला , सलाम नमस्ते ,सरकार , दस , वक़्त , काल , धूम २ ,कृष , लगे रहो मुन्ना भाई ,फ़ना , डान, रंग दे बसंती ., कभी अलविदा ना कहना , फिर हेरा फेरी , भागमभाग. विवाह , ॐ शांति ॐ , वेल्काम , चक दे इंडिया , तारे ज़मीन पर , पार्टनर , भूल भुलैया , हे बेबी , गुरु , तारा रम पम, नमस्ते लन्दन , गजिनी , रब ने बना दी जोड़ी , सिंह इज किंग , रेस, जोधा अकबर , जाने तू या जाने ना ., गोलमाल रिटन , दोस्ताना , बचना ए हसीनो , टशन , ३ इडिएट , लव आज कल अजब प्रेम की गज़ब कहानी , वांटेड ,न्यू योंर्क, कमीने ,आल दा बेस्ट , ब्लू , दिल्ली ६ ,पीपली लाइव , राजनीति , वंस उपन टाइम इन मुंबई , इश्किया , उड़ान , रोड , लव सेक्स और धोका , दबंग , गुज़ारिश , फस गया ओबामा |

2001 se vartmaan tak

इस दशक में जो वाक्य काफी प्रभावी रहा वह है "फिल्म जगत में सिर्फ दो ही स बिकते है - शाहरुख़ खान और सेक्स | ऐसा नहीं है कि इन दोनों विषयों के अलावा फिल्मे नहीं बनी ,पर जो प्रसार उनको मिला वो और किसी को नहीं | व्यवसायिकता, फिल्म जगत पर इस कदर हावी हो गई कि निर्माताओ को फिल्मों से बने पैसों के अलावा और कुछ दिखाई नहीं दे रहा | चाहे वोह नंगे बदन दिखा कर ही क्यों ना कमाया जा रहा हो | यह समय फिल्म जगत के इतिहास कि कुछ बड़े बजट की फिल्मों के लिए भी याद किया जाएगा | इनमे से कुछ है देवदास, दा हीरो, कोई मिल गया, दा राइजिंग, जोधा अकबर, कृष ,सिंह इस किंग, ब्लू ,शिवाजी, लव स्टोरी 2050 आदि |
  मूल्य विहीनता और ओछेपन की बात की जाए,तो भी ये दशक अव्वल नंबर का कहा जाएगा | तोबा तोबा, फ़न,हवस,जुली,जिस्म ,पाप , मर्डर,  कुछ ऐसी फिल्मे है जो मात्र पैसा कमाने के लिए बनाई गयी | इन फिल्मों ने न सिर्फ भारतीय फिल्मों का स्तर गिराया है बल्कि सामाजिक उन्माद को बढावा देकर नारी की प्रवित्र छवि को ठेस पहुंचायी है |
          इस दशक में पुरानी फिल्मों को एक नया लिबास में लपेटकर नये अंदाज़ में दर्शको के सामने प्रस्तुत किया गया | मुग़ल ए आज़म, ताजमहल,नया दौर, रामू की आग आदि  ऐसी ही फिल्मे है | कुछ निर्देशक लीक से हटकर फिल्म बनाने के लिए प्रचलित रहे | जिसमे हम दिल दे चुके सनम,ब्लैक, गुज़ारिश के संजय लीला भंसाली, लगान के आशुतोष गोवारिकर,कंपनी, फूँक, भूत,जंगल, आदि के  लिए राम गोपाल वर्मा और फिल्म पेज थ्री, फैशन,ट्रेफिक सिग्नल आदि फिल्मों  के  लिए मधुर भंडारकर आदि  प्रमुख रहे |  
  यह दशक अपनी उच्च कोटि के अभिनय और अदभुत तकनीक के लिए भी याद किया जाएगा |दिल चाहता है,कल हो ना हो, मुन्ना भाई एम बी बी एस ,मोहब्बतें , मैं हूँ ना , मई नेम इस खान आदि कुछ ऐसी ही फिल्मे है | आमिर खान की फिल्म "लगान" ने दर्शको को प्रभावित किया और यह फिल्म ओस्कर के लिए भी नामांकित की गई | इस अवधि की एक और विशेषता हिंगलिश फिल्मों का निर्माण रही | यह फिल्मे विदेशी तथा भारतीय सिनेमा का मिला जुला रूप रही | इन फिल्मों ने ना सिर्फ भारतीय जनता को बल्कि विदेशो में रह रहे अप्रवासी भारतीयों को प्रभावित किया | बेंड इट लाइक बेख्क्हम, मोंसून वेद्डिंग , मई नेम इस खान , कल हो ना हो , नमस्ते लन्दन आदि ऐसी ही फिल्मे है | 

film itihas 2

दक्षिण भारत में फिल्म उद्योग कि नीव आर.नटराज मुदलियार ने रखी |उन्होंने दक्षिण भारत की पहली कथा फिल्म "कीचक वधंम" का निर्माण 1919 में किया | द्वारका दास संपत बम्बई में फिल्मों का प्रभुत्व बनाने वाले व्यक्तियों में से एक थे | 1918 में उन्होंने 'राम बनवास' नाम से भारत के पहले धारावाहिक फिल्म का निर्माण किया | 1919 में उन्होंने 'कोहिनूर फिल्म कंपनी' का निर्माण किया, जिसके बैनर तले कटोरा भर खून (बम्बई में बनी पहली सामाजिक फिल्म ),भक्त विधुर (1921),काला नाग (1924) आदि फिल्मों का निर्माण हुआ | बम्बई स्तिथि कोहिनूर स्टूडियो को एक समय में वो ख्याति प्राप्त थी,जो हालीवुड में एम.जी.एम को प्राप्त थी | अपने इस योगदानो की बदोलत 'द्वारका दास संपत' को बम्बई फिल्म उद्योग का जनक मन गया |                                            उत्तर भारत में स्थापित होने वाली पहली कंपनी 'द ग्रेट इस्टर्न फिल्म कॉर्पोरेशन लि,' थी | इसकी स्थापना 1924 में पंजाब में हिमांशु राय ने की थी | इसके अंतर्गत बनी फिल्म 'लाइट ऑफ़ एशिया' लन्दन में दस महीने चली | अंतराष्ट्रीय क्षत्र में भारत को प्रशिष्ठा दिलाने वाली यह पहली फिल्म थी |
                           बंगाल में फिल्म उद्योग के स्थापक के रूप में जिस व्यक्ति को ख्यति प्राप्त है,उनको लोग मदन लाल साहब के नाम से जानते है | इन्होने फाल्के कि फिल्म को बंगाल में प्रदर्शित किया | 1927 तक पूरे भारत वर्ष के 346 सिनेमाघरों में 86 इन्ही के थे | इन्होने 1907 में कलकात्ता में 'एलफिस्टन पिक्चर पेलेस' नाम से प्रथम स्थाई सिनेमाघर का निर्माण किया | बंगाल का प्रथम कथा चित्र विल्ब मंगल भी इन्ही कि कृति थी |
                    1931 में भारत कि पहली सवाक फिल्म 'आलमआरा' का निर्माण आर्देशिर इरानी ने किया | और एक बार फिल्मों को ज़बान क्या मिली,उन्होंने फिर कभी मुडकर नहीं देखा | भारत में एक्शन और साहसिक कारनामो से भरी फिल्म बनाने का श्रेय वाडिया बंधूओ को प्राप्त है | जे.बी.एच. वाडिया ने छोटे भाई होमी वाडिया के साथ मिलकर हालीवुड कि एक्शन फिल्मों से प्रभावित हो कई स्टंट फिल्मों का निर्माण किया | उनकी पहली फिल्म 'थंडर बोल्ट' थी | इनकी अन्य स्टंट फिल्मों में लाइनमैंन (1932 )   हिवल विंड (1933 ),दिलरुबा डाकू (1933 ) आदि मुख्य थी |
          1918 में चलचित्र उद्योग कि देख तात्कालीन ब्रिटिश सरकार ने 'सिनेमाटोग्राफ  एक्ट' पास किया | 1920 में प्रथम इंडियन फिल्म सेंसर बोर्ड कि स्थापना हुई | उस समय बोर्ड का मुख्य उद्देश्य फिल्मों को राष्ट्रवादी विचार धारा एवं सरकार विरोधी भावना के प्रभाव से बचे रखना मात्र था | इसी आधार पर कोहिनूर फिल्म कंपनी कि 'भक्त विदुर' पूर्ण रूप प्रतिबंधित कर दी गयी | बंगाल में 1922 और बम्बई 1923 में ब्रिटिश सरकार द्वारा मनोरंजन कर लागू कर दिया गया | प्रारंभिक भारतीय फिल्मे पचिमी देशो कि फिल्मों कि तुलना में तकनीकि एवं कलात्मकता के लिहाज़ से कमतर थी | लेकिन इन फिल्मों ने कुछ कहे ही, भारतीयों को उनकी शक्तियों को दर्शाया | सामाजिक फिल्मों के द्वारा भारतीयों को उन में बसी समस्याओ के बारे में बताया गया और उनसे निजात पाने के रास्ते भी सुझाए गए | महिला सशक्तिकरण कि विचार धारा भी फिल्मों के माध्यम से दर्शको तक पहुंचायी गई | महान साहित्कारो के उपन्यास तथा कहानिया फिल्मों के माध्यम से आम जनता तक पहुंचायी गई | अतंत: प्रारंभिक फिल्मों ने लोगो को मनोरंजन प्रदान करने के साथ साथ समाज के प्रति सचेत भी किया | क्या सही- क्या ग़लत तर्क करने कि बुद्धि प्रदान कि और उनमे नई कांति को संचारित किया |

Saturday, February 5, 2011

film itihaas

तकनिकी पहलुओ को दरकिनार कर देखा जाए,तो भारत वर्ष में सिनेमा के दुसरे तत्व काफी पहले से मोजूद थे | लोकनाटक, कठपुतली कला आदि के रूप में अभिनय तथा उसका मंचन प्रारंभ हो चूका था | परन्तु इन सब चीजों को काल्पनिकता में पिरो कर परदे पर साकार करने का कार्य कैमरा तथा तकनीकी उपकरण के अविष्कृत हो जाने के बाद ही मूर्त रूप ले सका | फोटोग्राफी के आविष्कार के साथ ही 1820 में ओप्टिकल खिलोने के रूप में सिनेमा कि नीव रख दी गयी थी | 1878 में एडवर्ड मुयाब्रिज ने जोट्रोप पर एक मिनट में केई तस्वीरे दिखाकर चित्रों में गतिशीलता लाने कि सफल कोशिश कि तप्त्पश्चात 1890 में केइनेतो - स्कोप का अविष्कार किया और चलचित्र प्रभाव को नया आयाम दिया  |इतना कुछ होने के बाद भी उस समय किसी ने यह नहीं सोचा होगा कि  सिनेमा संचार के इतने सशक्त माध्यम के रूप में उभरेगा |
   भारत में फिल्मों कि शुरुआत मूक फिल्मों के साथ हुई और ये दौर 1930 तक चला | श्री हिरा लाल सेन को भारत में चलचित्र का जनक मन जाता है | 1898 में उन्होंने राल्स बाईस्कोप कंपनी बनाई और चलचित्रों का प्रदर्शन किया | उन्होंने स्वनिर्मित कैमरे से 1901 से 1905 के बीच में बारह नाटक का फिल्म्कान किया | सेन ने ही सर्वप्रथम विज्ञापन फिल्मों का निर्माण प्रारंभ किया | उन्होंने अपनी फिल्मों में नये कोण से छायाकान,क्लोज-अप, टॉयटल्स प्रदर्शन आदि तकनीक का प्रथम प्रयोग किया |
         सवे दादा तथा हिरा लाल सेन के बाद चलचित्र निर्माण में कई लोगो ने अपना योगदान दिया |जैसे - के थाने वाला ,प्रो.एडरसन,जमशेद जी मदन आदि | पर वह व्यक्ति जिसने फिल्म जगत का स्वरुप ही बदल कर रख दिया, वो थे दादा साहब  फाल्के | उन्होंने भारत कि पहली कथा फिल्म राजा हरीशचंद का निर्माण 1913 में किया |  यह उन्ही के अथक प्रयासों का परिणाम था कि भारतीय फिल्म उद्योग ने समाज में अपनी जड़े जमानी शुरू कि |अपने इन्ही प्रयासों के बदोलत दादा साहब को भारतीय फिल्मों के जन्मदाता कि उपाधि से नवाज़ा गया |
      "राजा हरीशचंद" दादासाहब फाल्के के अथिक परिश्रम का परिणाम थी | इस फिल्म को बनाने में उन्हें आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ा | आठ महीने के संघर्ष के उपरात जब यह मूक फिल्म तैयार हुए,तो  दादा साहब फाल्के को उनकी म्हणत का प्रतिफल मिला | इस फिल्म से हुई अपार सफलता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि एकत्रित आय को बैलगाड़ीयो से पोलिसे के देख रखाव में एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जाता था | उन्होंने 1913 में ही मोहिनी भरमासुर और 1914 में सावित्री सत्यवान का निर्माण किया | तकनिकी दृष्टि दादा साहब फाल्के कि ये फिल्मे बेजोड़ थी | 1918 में दादा साहब फाल्के  ने हिंदुस्तान फिल्म कंपनी बनाई और उसके अंतरगत कई मशहूर फिल्मों का निर्माण किया | उन्होंने कथा फिल्मों के साथ साथ लघु फिल्मे/ डाक्युमेंट्रीयो का कि निर्माण किया | 64 वर्ष कि आयु में  उन्होंने एक सवाक फिल्म गंगोवतरन 1937 में बनाई | यह उनकी आखिरी फिल्म थी | 1937 में दादा साहब फाल्के ने फिल्म निर्माण से अलविदा भले ही कह दिया हो, पर तब तक उन्होंने भारतीय फिल्म जगत को वो नीव प्रदान कर दी थी,जिसके बल पर आज भारतीय सिनेमा जगत, जिसे हालही में सरकार द्वारा एक उद्योग का दर्जा प्राप्त हुआ है, कि गगनचुबी ईमारत शान से खाड़ी है | 







निष्कर्ष
तमाम अन्य बातों पर दीगर करने पर एक बात तो स्पष्ट रूप से सामने आती है कि एंग्री यंगमैंन वाले चरित्र निरीह हो उठे और उसकी जगह ले ली हलके फुल्के चोकोलेटी युवओं ने जो प्रेम के लिए सब कुछ त्यागने  को तैयार रहते थे | मुख्य कथानक का मुख्य चरित्र अब पहले जैसे ग्रामीण युवक न होकर एक ऐसा व्यक्ति होता है जो बचपन से विदेशो में रह और अपनी युवावस्था में किसी कार्य को करने के लिए अपने देश लौट जाते है और बाद में वोह हीरो बन जाते है | खैर इसका प्रभाव भारतीय सिनेमा पर साकरात्मक अर्थो में हुआ | लोग उब चुके थे और सिनेमा में नयापन देखने के इच्छुक थे, और फिल्मों में यह एक प्रयोग था जिसका दर्शको में ज़बरदस्त प्रभाव पड़ा और भारतीय जन जीवन जो गाँव में बसते है उठकर सुन्दर देशो में कैमरे द्वारा सैर करने लगे | सहजता से अंग्रेजी बोलते पात्र,सबको प्रभावित करने लगे | और धीरे-धीरे यह पात्र रुपहले परदे पर छा गए | 

bhumika

हलाकि सिनेमा का कला के रूप में जन्म आज से 100 वर्ष पूर्व हो चूका था | अगर भारतीय सिनेमा को देखे तो दो भागो में बटा | स्पष्ट रूप से दुष्टिगोचर होता है | एक तो 1913 - 1930 - मूक फिल्मों का दौर, 1931 - अब तक सवाक फिल्मों का दौर|
             भारतीय सिनेमा हर दस वर्ष में बदला |1931 के बाद ४० तक समाजिक  फिल्मों का दौर रहा | 1948 में राजकपूर की 'बरसात' से रोमांटिक इरा की शुरुआत हुई और इसी का फेनेटिक रूप 1990 के वर्षो में दुष्टिगोचर होता है | जैसे की प्रेम प्रसंगो पर कहानी का ताना बाना , और मुख्य चरित्र का किसी बाहरी देश से आना | अर्थात N.R I चरित्र | दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे  से  N.R I चरित्र फिल्मों का मुख्य किरदार बना | तमाम पुराने मिथक और दरे में बदलाव आया | ये चरित्र फैंटेसी से गड़ा गया | एक स्तेरियोपइप चरित्र होते है जो अपना प्रेम प्राप्त करने के  लिए सात समंदर पार से आते है | और अपनी महबूबा को अपने साथ ले जाते है | और इस तरह N.R I चरित्रकी भूमिका दर्शको के सामने आइ |